**धर्म का प्रारंभ अनुभव से होता है, जब हम ईश्वरीय सत्ता की झलक अपने में ही पा लेते हैं।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

जिस आचरण का पालन करने से जीवन में उन्नति होती हो तथा आध्यात्मिक जगत को जानकर परम कल्याणकारी शाश्वत सुख की प्राप्ति हो, उसी को धर्म कहा गया है। जब मनुष्य धर्म के मार्ग पर अग्रसर होता है तब ही वह जीवन में सुख, समृद्धि एवं शांति प्राप्त कर सकता है। शास्त्रों में कहा गया है -

'धृति: क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।

धीर्विद्या सत्यमक्रोध: दशकं धर्म लक्षणम्।।

    धर्म के दश लक्षण बताते हैं कि जिस व्यक्ति में धैर्य, क्षमा, मन का संयम, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, शुभ कर्मों से शुद्ध बुद्धि, मन वाणी कर्म में एकता, उत्तम विद्या, अक्रोध इत्यादि गुण आते हैं। अर्थात जो मनुष्य धर्म को जान लेता है, उस मनुष्य में ये लक्षण अपने आप ही प्रकट हो जाते हैं। मनुष्य का शरीर एक पवित्र मंदिर है, जिसमें परमेश्वर पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित है।

      अतः कहा है कि - "शरीरमाद्यं खलुधर्म साधनम्"  अर्थात मानव तन माध्यम है, धर्म को साधने का। इस मानव तन के द्वारा ही धर्म की प्राप्ति संभव है। धर्म का सम्बन्ध केवल बाह्य लक्षणों से नहीं है। केवल बाह्य कर्मों द्वारा यदि हम कहें कि हम धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं तो यह सत्य नहीं है।

    धर्म का प्रारंभ ही अनुभव से होता है। जब हम ईश्वरीय सत्ता की झलक अपने में ही पा लेते हैं, तब हम धर्म के लक्षणों को धारण करते हुए, जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि की प्राप्ति करते हैं और जीवन में ही दिव्य शक्ति को जानकर स्वयं का परम कल्याण कर लेते हैं।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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