सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
अहम् प्रश्न यह है कि आज मनुष्य भक्ति तो खूब कर रहा है परंतु फिर भी दुखी है क्यों? इतनी भक्ति करने पर भी जीवन में परिवर्तन क्यों नहीं है? प्रभु क्यों नहीं आते? करण एकमेव -इंसान ईश्वर की खोज तो कर रहा है परंतु बाहर! इसलिए वह ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाता, ईश्वर को न मिलने के कारण ही इंसान वास्तव में दुखी व अशांत है। वह परमात्मा सब सुखों की खान हैं, आनंद व शांति का स्रोत है। अतः आवश्यकता है गुरु की कृपा से ईश्वर को अपने अंतर्घट में ही प्राप्त करने की। तभी कबीर जी ने कहा-
*बस्तू कहीं, ढूंढे कही,किह विधि आवै हाथ। कहे कबीर तब पाइये जब भेदी लीन्हा साथ।।*
अर्थात ईश्वर को बाहर नहीं अपने अंतर्घट में जानना होगा और उसके लिए किसी भेदी अर्थात पूर्ण गुरु की शरणागत होना होगा।
ईश्वर हमारे हृदय में निवास करता है। दो हृदय होते हैं एक होता है स्थूल हृदय, जिससे खून का दौरा आदि चलता है और दूसरा है सूक्ष्म अर्थात आध्यात्मिक हृदय। शास्त्रों के अनुसार यह वह स्थान है जहां माताएं, बहने बिंदी लगाती है और पंडित जन तिलक लगाते हैं। यही वह स्थान है जिसको श्री रामचरितमानस में दिव्य दृष्टि, गीता में दिव्य चक्षु, कुरान में नुक्ता ए संवेदा, और चश्मे बातिन, बाइबल में सिंगल आई या आई ऑफ़ द सोल, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दिब द्रिस्टी, पुराणों में शिव नेत्र या तृतीय नेत्र कहा गया है। जिसके द्वारा ईश्वर को देखा जाता है। एक पूर्ण सतगुरु ही ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देते समय इस नेत्र को खोलते हैं इस नेत्र के खुलते ही शिष्य अपने भीतर अनंत प्रकाश देखता है, ईश्वर का साक्षात्कार करता है। इसका अनेकों उदाहरण , जिन्होंने अपने अंतर्घट में ईश्वर देखा स्वामी विवेकानंद, मीराबाई, योगानंद जी, नामदेव, इत्यादि।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
