**इस जगत में उसी का जन्म सफल है जो संतों की संगत के साथ मिलकर प्रभु के नाम का सुमिरन करता है**

सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

एक राज्य का नियम था कि वहाँ एक वर्ष के लिए राजा बनाया जाता था। उसके बाद उस व्यक्ति को नदी पार वनों में छोड़ दिया जाता था। जंगल में बहुत से खूँखार जानवर थे जो उस व्यक्ति को मारकर खा जाते थे।

    एक बार जब एक व्यक्ति राजा बनाने के लिए चुना गया तो उसने अपने मंत्रियों को बुलाया और पूछा कि मुझे भी एक वर्ष के बाद जंगल में जाना पड़ेगा? तब सभी ने कहा कि इस नियम का पालन तो आपको भी करना पड़ेगा।

     राजा ने सोचा कि ऐसे राज्य को भोगने का क्या लाभ जो एक वर्ष के बाद मृत्यु को प्राप्त करना होगा। ऐसा विचार कर राजा एक संत के पास गया और अपनी व्यथा को सुनाया। राजा ने कहा कि मैं बहुत दुखी हूँ। जैसे-जैसे दिन व्यतीत कर रहा हूं, वैसे-वैसे मृत्यु की तरफ बढ़ रहा हूँ। तब संत ने कहा कि राजन यह स्थिति केवल आप की ही नहीं है बल्कि यह स्थिति तो संसार के प्रत्येक मनुष्य की है।

     संत जी से सत्संग सुन राजा उनके चरणों में गिर पड़ा। और कहने लगा मुझे भी ज्ञान दीजिए ताकि मैं भी प्रभु की भक्ति करके जीवन को सफल बना सकूं। तब संत ने उसे ज्ञान दिया। राजा को अनुभव करा दिया कि किस प्रकार वह प्रभु हमारे हृदय में ही विराजमान हैं।

    तब संत ने राजा को जीवन बचाने का तरीका भी बता दिया। राजा ने सुख चैन से पूरा वर्ष राज्य भोगा। राज्य भोगते हुए प्रभु भक्ति में भी सुबह शाम लगा रहा। इस प्रकार भक्ति करते हुए एक वर्ष बीत गया। मंत्रीगणों ने राजा से कहा कि - अब आप राज्य को त्याग नौका पर आ जाएं, ताकि हम आपको नदी के पार जंगल में छोड़ आएं। राजा राजसी वस्त्र उतार उनके साथ चल पड़ा। राजा प्रसन्नचित्त होकर सारी प्रजा से विदा लेता है।

    राजा प्रसन्नचित्त है, परंतु मंत्रीगण आश्चर्यचकित हैं। एक मंत्री ने पूछ ही लिया, जंगल में भयंकर जानवर रहते हैं, फिर भी आप प्रसन्न क्यों हैं? आपसे पहले जितने भी व्यक्ति राजा बने उनको नौका में बिठाने लाया जाता था तो बहुत रोते थे।

    तब राजा ने हँस कर कहा कि पहले जितने भी व्यक्ति राजा बने वे सब मूढ़ बुद्धि थे, जिन्होंने केवल राज्य सुख को ही भोगा। मैने राज्य के सुख मात्र को ही नहीं भोगा वरन् अपनेआगे का जीवन भी सँवारा। मैने कुछ व्यक्तियों के द्वारा वन को कटवा दिया। सैनिकों को भेजकर भयंकर जानवरों को जो कि जीवन के लिए खतरा था, समाप्त करवा दिया। इसलिए जिस भयंकर जंगल में आप मुझे भेज रहे हैं वहाँ अब भयंकर जंगल नहीं वरन् एक छोटी सी नगरी का निर्माण हो चुका है जहाँ मैं आनंद से बांकि का जीवन व्यतीत करुंगा।

     इस जगत में उसी का जन्म सफल है जो संतों की संगत के साथ मिल कर प्रभु के नाम का सुमिरन करता है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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