**मनुष्य जीवन का महत्व तभी है जब जीव प्रभु की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद श्रीकृष्ण द्वारिका जाते वक्त कुन्ती के पास जाते हैं और कहते हैं कि बुआ माँगो तुम्हें क्या चाहिए। तब कुन्ती ने कहा कि जितने संसार के दुख हैं वे सब मुझे दे दो। श्रीकृष्ण कहते हैं सारा जीवन आपने दुख ही तो देखे हैं, फिर भी आप दुख माँग रही हैं। कुन्ती ने कहा आज तक हमारे ऊपर दुख थे तो आप हमारे साथ थे। और आज जब यह राज्य मिला तो आप हमें छोड़कर जा रहे हैं। ऐसे सुख का क्या लाभ जो हमें आपसे दूर कर दे।

     यह संसार तो दुख और स्वार्थ से भरा हुआ है। इस मायामय जगत में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति सुख प्राप्ति की इच्छा से सांसारिक कर्मों में लिप्त है।

     संसार में मनुष्य एक कर्म से छुटकारा पाने के लिए दूसरा कर्म करता है। परंतु वह दूसरा कर्म अन्य कर्मों को जन्म देता है जो बन्धन एवं दुख का कारण सिद्ध होते हैं। जिस प्रकार एक बीज से वृक्ष की उत्पत्ति होती है फिर नये बीजों की उत्पत्ति हो जाती है। और फिर उन बीजों के द्वारा और कितने ही नये वृक्ष उत्पन्न हो सकते हैं। लेकिन यदि उस बीज को अग्नि में डाल दिया जाए तब वह बीज अग्नि में जलकर भस्म हो जाता है। ठीक उसी प्रकार कर्मों के बन्धन से, कर्मों के दुखों से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय है- 'ज्ञान'। ज्ञान अग्नि के द्वारा ही जीव कर्म के बन्धन से छुटकारा पा सकता है।

      यह मानव तन जीव को प्रभु की प्राप्ति के लिए ही मिला है। मनुष्य जीवन का महत्व तो तभी है, जब जीव प्रभु की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो। क्योंकि केवल वह परमात्मा ही परम सुखदायक है और जीव को इस मायामयी जगत के दुखों और बन्धनों से छुटकारा दिलाने में पूर्णतया समर्थ है।

     अतः हमें आत्मज्ञान को प्राप्त कर उस प्रभु की प्राप्ति की ओर अग्रसर होना चाहिए जो हमें परम सुख एवं शान्ति प्रदान करने वाला है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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