सोचता हूं ।

 

आत्मा को अजन्मा, नित्य और पुरातन बताते हुए श्री कृष्ण अपने परमसखा अर्जुन से कहते हैं कि अर्जुन! जिस तरह मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़ कर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है,उसी तरह ही जीवात्मा पुराने शरीरों को छोड़ कर दूसरे नये शरीरों को धारण करता है। यह आत्मा तो अछेद्य,अदाह्य, अक्लेद्य,

अशोष्य, अव्यक्त, अचिंत्य और अविकार्य है। अतः अर्जुन! तू शोक का त्यागकर ।

यदि तू आत्मा को सदा जन्मनेवाला और मरनेवाला समझता है तो भी तू शोक मत कर क्योंकि जो मनुष्य जन्म लिया है उसे

मरना है और जो मनुष्य मर गया है उसे जन्म लेना है,यह अटल है‌।–

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्ममृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येsर्थे नत्वंशोचितमर्हसि।।–

गीता, अध्याय २, श्लोक २७ 

             प्रस्तुतकर्ता 

     डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे 

                 गोरखपुर।

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