**सुख अथवा दुख की अनुभूति परिणाम में ही छिपी होती है**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

सुख एवं दुख मनुष्य की आन्तरिक अवस्था है। अर्थात सुख एवं दुख का अनुभव मनुष्य की आन्तरिक अवस्था पर निर्भर करता है। महत्व इस बात का नहीं कि दूसरों का व्यवहार हमारे प्रति कैसा है, अपितु इस बात का है कि हम दूसरों के द्वारा किए जाने वाले व्यवहार को किस दृष्टि से लेते हैं। जिस प्रकार एक कुएं पर दो चरखियाँ लगी हुई थी। उन चरखियों पर चलने वाली रस्सी के साथ दो बाल्टियाँ बंधी हुई थी। उनमें से एक बाल्टी प्रसन्न रहती थी और दूसरी बाल्टी हर समय दुखी रहती थी। एक दिन प्रसन्न रहने वाली बाल्टी ने दूसरी से पूछा कि तू हर समय दुखी क्यों रहती है? दूसरी बाल्टी ने कहा कि दुखी न होऊँ तो और क्या करुँ? मैं तो हर समय कुएं से भरकर बाहर आती हूँ परंतु लोग मुझे खाली कर फिर कुएं में फेंक देते हैं। इतना कहने के बाद दूसरी बाल्टी ने पहली से पूछा कि तू प्रसन्न कैसे रहती है, जबकि हम दोनों का काम तो एक सा ही है। पहली बाल्टी ने कहा कि मैं इसलिए प्रसन्न रहती हूँ कि लोग मुझे खाली करके कुएं में फेंकते हैं परंतु मैं फिर भरकर बाहर आती हूँ। कहने का भाव है कि स्वयं के प्रति दूसरों के द्वारा किया जाने वाला व्यवहार हमारे दृष्टिकोण के अनुसार ही सुख एवं दुख का कारण बनता है।

     आज के भौतिक युग में अधिकतर मनुष्य केवल सांसारिक धन सम्पत्ति इत्यादि को ही सुख का हेतु मानते हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं कि केवल सांसारिक धन सम्पत्ति इत्यादि के द्वारा ही हमें सुख की प्राप्ति हो जाए।

      यह मानव का सबसे बड़ा भ्रम है कि उसके पास अपार धन सम्पत्ति है, कारोबार चल रहे हैं, किसी भी प्रकार के पदार्थ की कोई कमी नहीं, इसलिए वह सुखी है। आज इसी मृगतृष्णा में मानव भटक रहा है जबकि सांसारिक वस्तुओं में सुख नहीं है। कई बार मनुष्य के सामने ऐसी परिस्थिति भी आती है कि संसार में मिलने वाला कष्ट भी हमें सुख प्रदान कर देता है। जैसे कि पाँव में काँटा लग जाए तो हमें कितना दर्द होता है। डाक्टर के पास जाते हैं तो वह भी हमें सूई चुभोता है। हमें दर्द तो होता है परंतु हम डाक्टर का धन्यवाद करते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि डाक्टर के द्वारा सूई चुभोने वाला दर्द हमें रोग से मुक्ति दिलाने के लिए है।

     अतः सुख अथवा दुख की अनुभूति परिणाम में ही छिपी हुई है। जिस किसी भी उपलब्धि का परिणाम हमें सुख देता है वह उचित है और जिस उपलब्धि का परिणाम हमें दुख दे, वह अनुचित है, हमारे लिए दुख का कारण है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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