सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
यह संसार कर्मों की खेती है और मनुष्य इस खेती को करने के लिए बाध्य है। जिस प्रकार किसान जो भी बीज खेत में बोता है, उसे वही फसल काटनी पड़ती है। इसी प्रकार मनुष्य भी जैसे कर्म करता है उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। इसी कर्म रूपी खेती को काटने के लिए मनुष्य को बार बार इस संसार में विभिन्न प्रकार की योनियों में जन्मना और मरना पड़ता है। यही बन्धन है, जो मनुष्य को उसके लक्ष्य, उस परम धाम तक पहुंचने नहीं देता। मनुष्य इसी कर्म के बन्धन के कारण ही भटकता रहता है।
अब यदि मनुष्य चाहे कि वह कोई कर्म ही न करे जिससे कर्म का बन्धन उसपर न पड़े तो यह असम्भव है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं - "व्यक्ति को प्राकृतिक गुणों के बंधन में होने के कारण विवशतावश कर्म करने पड़ते हैं।" परंतु मनुष्य को यह विचार करना है कि वह किस प्रकार कर्म के मार्ग पर चलता हुआ जीवन को सफल बनाए। केवल अच्छे कर्मों के द्वारा ही जीवन का कल्याण संभव नहीं है।
वन गमन के दौरान प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण बैठे थे। अचानक प्रभु श्रीराम हँस पड़े। उन्होंने लक्ष्मण से कहा- देखो, सामने वह जो कीड़ा पेड़ पर चढ़ रहा है परंतु बार बार नीचे गिर जाता है। लक्ष्मण ने पूछा प्रभु इसमें हंसने वाली क्या बात है। तब प्रभु श्रीराम ने कहा- जिस कीड़े को तुम देख रहे हो इसमें जो चेतन शक्ति है अर्थात् यह जीवात्मा अठारह बार राजा इन्द्र की गद्दी पर बैठ चुका है। परंतु इसके बाद भी यह चौरासी लाख योनियों में भटक रहा है। अर्थात जब मानव रूप मिला, अच्छे कर्म किए, अश्वमेघ यज्ञ किए, स्वर्ग के राजा इन्द्र की गद्दी मिल गई। सुख ऐश्वर्य भोगा। फिर चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद मानव तन, फिर इन्द्र की गद्दी और इसके बाद अब पुन: चौरासी लाख योनियों में ही भटक रहा है।
यहाँ पर हमें यह संकेत मिलता है कि केवल अच्छे कर्मों के द्वारा भी कल्याण सम्भव नहीं है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
