सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - "जो मनुष्य वात, पित्त, कफमय शव तुल्य शरीर को ही अपनी आत्मा मानते हैं। स्त्री, पुत्र आदि को ही अपना समझते हैं और मिट्टी, पत्थर, पीतल, स्वर्ण आदि को ही पूजना जानते हैं और जो केवल जलमय तीर्थ को ही तीर्थ स्थान समझते हैं एवं ज्ञानी महापुरुषों की शरण में नहीं जाते वे मनुष्य होने पर भी पशुओं में भी नीच गधे के समान ही हैं। क्योंकि संत ही परम कल्याणकारी चैतन्य तीर्थ हैं।"
भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से मानव को समझाते हैं परंतु अज्ञानी मनुष्य स्वयं द्वारा निर्मित अनेकों मार्ग बनाए बैठा है। अज्ञानतावश इस तरह भ्रमित है कि यदि कोई अँगुली से संकेत करे कि तुम प्यासे हो, सामने घड़े में से पानी पी लो। परंतु यदि कोई व्यक्ति बताने वाले की अँगुली पकड़कर उसकी महिमा गाने लगे तो हम उसे मूर्ख ही कहेंगे। क्योंकि प्यास तो पानी को पीने से बुझेगी, न कि अँगुली की महिमा गाने से।
जो सांसारिक सुखों की कामनाओं के कारण अनेक प्रकार से देवी देवताओं की पूजा करते हैं, उनके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं मोक्ष का स्वामी हूँ लोगों को संसार सागर से पार करता हूँ। जो सकाम पुरुष अनेक प्रकार के व्रत और तपस्या पूजा, जप, तीर्थ करके विषय सुख की अभिलाषा से मेरा भजन करते हैं, वे मेरी माया से मोहित हैं वे मन्दभागी हैं।
अतः इस प्रकार मनुष्य अज्ञानतावश कर्म तो कर रहा है परंतु यह नहीं जानता कि अज्ञानता की नींद में वह स्वयं का ही नुकसान कर रहा है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम**
"श्री रमेश जी"
