**जब ईश्वर हमारे भीतर है तो हम उसे बाहरी क्रियाओं द्वारा कैसे प्राप्त कर सकते हैं**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

गुरुवाणी में कहा गया है कि हमारे दुखों को मूल सहित नाश करने वाले तो वह दीन दयालु प्रभु ही हैं। परंतु कहते हैं कि हमने उसके संग रुचि ही नहीं बढ़ाया। यह जगत तो इस तरह है जिस तरह निद्रावस्था में आया हुआ स्वप्न। जिस प्रकार निद्रावस्था में आया हुआ स्वप्न मिथ्या है, ठीक उसी प्रकार यह जगत भी मिथ्या है। परंतु कहते हैं कि जीव इस शरीर के मोह में फँसा हुआ कर्म करता है।

    श्रीमद्भागवत पुराण में कहते हैं कि इस संसार में जीव अज्ञानतावश शरीर में बुद्धि के द्वारा भांति-भांति की कामनायें करता है और उनकी पूर्ति हेतु नाना प्रकार की कर्म उपासना करता है। फिर उसके फल स्वरूप देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी तथा नीच योनियों में भटकता फिरता है। परंतु अपनी वास्तविक गति व आत्म स्वरूप को नहीं पहचान पाता है।

   आदि शंकराचार्य विवेक चूड़ामणि में कहते हैं कि न सांख्य योग्य से, न कर्म से, न अष्टांग योग से और न विद्या से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। जब सद्गुरु की कृपा द्वारा ब्रह्म का बोध होता है, तभी मोक्ष प्राप्ति के मार्ग की प्राप्ति हो सकती है, अन्य किसी साधन के द्वारा नहीं।

     इस प्रकार मनुष्य के लिए धार्मिक ग्रन्थों के आधार पर यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि आज हमें जीवन के कल्याणार्थ जरूरत है तो ऐसे संत की, ऐसे सतगुरु की जो हमें सत्य को जना दे। जब वह ईश्वर हमारे भीतर है तो हम उसे बाहरी क्रियाओं द्वारा कैसे प्राप्त कर सकते हैं। कहते हैं कि लाठी को पीटने से साँप का भय दूर नहीं हो सकता। साँप के भय को दूर करने के लिए तो लाठी को नहीं साँप को खत्म करना होगा।

    ठीक इसी प्रकार उस कर्म को पहचानना होगा, जिसके द्वारा हम अपने अन्दर के साँप रूपी मन का संहार करके जीवन को सत्यता की तरफ ले जा सकें।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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