**जिसने प्रभु के ज्ञान को जान लिया, उसी के कर्म सार्थक होते हैं**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

आज के समय में मानव के लिए सबसे पहली विचारणीय बात यही है कि वह दुनिया की सुनी सुनाई बातों के पीछे न लगकर विचार करें कि किस तरह हम आत्म तत्व तक पहुंच सकते हैं। कर्म वही सार्थक है, जो हमें आत्मज्ञान तक पहुँचा दे। यदि आत्मज्ञान की प्राप्ति हो गई तभी कर्म सार्थक है और एक नवीन जागृति की ओर हम बढ़ सकते हैं। नहीं तो हमारी दशा उन भेड़ों के समान होगी जो एक के पीछे एक कुएँ में गिरती चली जाती हैं।

     परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि दी है विचार करने के लिए, सार आसार जानने के लिए, उचित-अनुचित का फैसला करने के लिए। देखना यह नहीं है कि लोग क्या कर रहे हैं, विचार करना है कि हमारे महापुरुषों ने धार्मिक ग्रंथों एवं धार्मिक स्थानों के द्वारा हमें किस आचरण को धारण करने की शिक्षा दी है। वह कौन सा आचरण है जिसे करने के बाद अन्य कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। जिसके बारे में कबीर दास जी कहते हैं -

'कबीरा एकै जानिया तो जानो सब जान।

जो वह एक न जानिया तो सब ही जान अजान।।'

     जिसने एक प्रभु के ज्ञान को जान लिया, उसी के कर्म सार्थक होते हैं। गीता में भी कहा है कि -

"जो उस ज्ञान की प्राप्ति कर लेते हैं जो तत्व मनुष्य के हृदय में छिपा हुआ है तब हृदय में छिपी हुई ज्ञानाग्नि के प्रज्ज्वलित होते ही कर्म उसमें दग्ध होने शुरु हो जाते हैं। वास्तव में उन्हीं को पंडित कहा गया है।"

     अतः वही कर्म को समझ सकता है जिसके हृदय में ज्ञान प्रकट हो गया।

*ओम् श्री आशुतोषाय नम**

"श्री रमेश जी"

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