**मानव के कल्याण के लिए जरूरत सिर्फ शिक्षा की नहीं अपितु दीक्षा की है**

सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

जब हम सत्संग के लिए कहीं भी जाते हैं तो हमें अधिकतर आचार व्यवहार की ही शिक्षा मिलती है। कोई कहता है कि क्रोध मत करो, तो कोई लोभ मोह की निन्दा करता है। परंतु क्या कारण है कि जिन विकारों की समाप्ति के लिए प्रचार हो रहा है, दुनिया में वही विकार हमें ज्यादातर नजर आते हैं।

      ऐतिहासिक जगत के कई किस्से हमें सुनने को मिलते हैं कि किस प्रकार सद्गुणों के द्वारा मानव में एक नवीन जागृति का संचार हुआ। परंतु क्या कारण है कि इतने सद्गुणों को पढ़ने एवं सुनने के बाद भी ये सद्गुण जगत में कहीं नहीं नजर आते हैं। हर ओर निन्दा, नफरत, द्वेष, काम क्रोध ही नजर आते हैं।

    केवल मात्र शिक्षाओं के आधार पर परिवर्तन असम्भव है। जिस प्रकार बीमार व्यक्ति को यदि हम कहें कि वह बिमारी को छोड़ दे, तो मात्र शिक्षा ही बीमारी का उपचार नहीं है। यहाँ पर बीमारी के त्याग की शिक्षा तो उचित है लेकिन केवल इन शिक्षाओं के आधार पर रोग दूर नहीं हो सकता। रोग का यथोचित उपचार शिक्षा नहीं चिकित्सा है।

    कहने का भाव है कि जिस प्रकार रोग से छुटकारा पाने के लिए शिक्षा की नहीं चिकित्सा की जरूरत है। ठीक इसी प्रकार बुरे विचारों से छुटकारा पाने के लिए जरूरत है सत्य को जानने की। सदाचार अर्थात, सत्+आचार। सत्य को जाने बिना हम सत्य के प्रति व्यवहार किस प्रकार कर सकते हैं। रोगी को शिक्षा की नहीं चिकित्सा की जरूरत है। शिक्षा तो केवल बता सकती है क्या उचित है क्या अनुचित।

     इसी प्रकार मानव के कल्याण के लिए जरूरत शिक्षा की नहीं अपितु "दीक्षा" की है। अतः हमें जरूरत है ऐसे संत सद्गुरु की जो हमें सत्य का बोध करा दे।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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