भगवान् श्रीकृष्ण स्थित बुद्धि (स्थिर बुद्धि
, बुद्धियोग,स्थितधी, स्थित प्रज्ञ आदि)
का लक्षण समझाते हुए अपने परमसखा अर्जुन से कहते हैं कि अर्जुन !जो पुरुष न शुभ को पाकर प्रसन्न होता है और न अशुभ को पा कर द्वेष करता है तो उसकी बुद्धि स्थित/ स्थिर है। जैसे कछुआ अपने अंगों को चारों तरफ से समेट लेता है वैसे ही जब यह पुरुष अपनी पंचज्ञानेन्द्रियों को उनके पंचविषयों से सब तरह से हटा लेता है तब उसकी प्रज्ञा/बुद्धि स्थित है अर्थात् वह स्थिर प्रज्ञ है। अर्जुन!सभी प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है उस नित्य सनातन परमात्मा की प्राप्ति में स्थित बुद्धि पुरुष जागता है, सदा सावधान रहता है और जिस नश्वर सांसारिक सुख को पाने केलिए सब प्राणी दिन-रात तल्लीन रहते हैं, बेचैन रहते हैं, परमात्मा के असल स्वरुप को जाननेवाले स्थित बुद्धि केलिए वह रात्रि के समान है, वह ध्यातव्य नहीं है। अर्जुन! जैसे अनेकानेक नदियों के जल सब तरफ से अचल परिपूर्ण समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं , वैसे ही सभी भोग विलास जिस स्थित बुद्धि पुरुष में किसी तरह का विकार/हलचल पैदा किए विना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परमशान्ति को प्राप्त होता है,भोगों को चाहने वाला नहीं।—
आपूर्यमाणमचल प्रतिष्ठं
समुद्रमाप: प्रविशंतियद्वद्।
तद्वद्कामा यं प्रविशंतिसर्वे
स शांतिमाप्नोति नकामकामी।।
गीता, अध्याय २,श्लोक ७०
प्रस्तुतकर्ता ,
डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे।
गोरखपुर ।
