**परमात्मा को जानने व पाने की एक प्रक्रिया है, जो ब्रह्मज्ञान यानि आत्मज्ञान से प्राप्त होती है**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


औषधि का सिर्फ नाम लेने से दुख दूर नहीं होता है। दुख दूर करने के लिए औषधि का सेवन करना होता है।

    मान लो लखनऊ यहाँ से 250 कि. मी. है। रोड पर माईल स्टोन होता है, जिसपर दूरी लिखा होता है। अगर किसी को लखनऊ जाना है और वो माइल स्टोन को पकड़ कर बार बार बोले कि लखनऊ 250 km है तो क्या वह लखनऊ पहुंच जाएगा? नहीं बिल्कुल नहीं। अगर उसे लखनऊ जाना है तो उसकी बिधि है। उसे बस या ट्रेन पकड़ना होता है तभी वह लखनऊ पहुंच सकता है।

    ठीक उसी प्रकार अगर हमें भगवान से जुड़ना है तो सिर्फ जाप करने से या धार्मिक पुस्तक पढ़ने से कुछ नहीं होता है। उस पुस्तक में जो लिखा है, उसपर हमें अमल करना होता है। उस परमात्मा को जानना होगा जो कि हमारे घट के भीतर ही हैं। और इसकी एक प्रक्रिया है। हमें ब्रह्मज्ञान यानि आत्मज्ञान प्राप्त करना होता है, जो किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु से ही मिलता है।

    इसलिए हमें ऐसे ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु की खोज करनी चाहिए जो हमें उस परमात्मा को हमारे घट के भीतर ही जना दे, दिखा दे। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान इस प्रक्रिया में कार्यरत है, बिल्कुल नि:शुल्क। हमने इस ज्ञान को प्राप्त किया है और हमारे जैसे लाखों साधकों ने भी प्राप्त किया है। और अपने मानव जीवन को सार्थक कर रहे हैं, जिसके लिए यह जीवन मिला है। 

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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