**मनुष्य संसार के प्रति इतना आकर्षित हो जाता है कि स्वयं अपने जीवन के रहस्य को ही भूल जाता है**

सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

शिखिध्वज नाम के एक नरेश थे। उनकी पत्नी का नाम था चूडाला। राज्य भोगते हुए उनकी युवावस्था बुढ़ापे में परिवर्तित होने लगी। चूडाला आत्मज्ञान प्राप्त कर ध्यान साधना के द्वारा प्रभु भक्ति में लीन रहने लगी। प्रभु भक्ति में तल्लीन रहने के कारण रानी के शरीर पर दिव्यता आने लगी। राजा ने चूडाला से पूछा कि ऐसा विलक्षण रूप तुमने कहाँ से प्राप्त किया? मुझे भी वह विद्या बताओ जिसके द्वारा तुम यौवनावस्था प्राप्त कर रही हो।

     चूडाला ने संसार के विकारों से ध्यान हटाकर प्रभु में लगाया और जीवन की सच्ची खुशी को जाना।राजा शिखिध्वज को उत्तर देते हुए कहा कि मैंने आत्मज्ञान को जानकर जीवन के रहस्य को जान लिया है। जिसके कारण यह अब मेरे अन्तर में संसार के प्रति किसी भी प्रकार की कोई कामना नहीं है। मुझे केवल प्रारब्ध के अनुसार अपने दैनिक कर्तव्यों को निभाना है। ईश्वर के शाश्वत खुशी को जानने के कारण ही मैं सौंदर्यवान एवं कान्तिमती नजर आ रही हूँ।

    राजा शिखिध्वज बोले - संसार में रहते हुए भला सांसारिक वस्तुओं की कामनाएं कैसे समाप्त हो सकती हैं। किसी न किसी कामना के कारण ही तो मनुष्य कर्म करता है। बेकार की बातें छोड़ो और राज्य सुख के आनंद को भोगो।

      यही स्थिति संसार की भी है कि मनुष्य संसार के प्रति इतना आकर्षित हो जाता है कि स्वयं अपने जीवन के रहस्य को ही भूल जाता है। यह तो ठीक है कि धन सम्पदा अच्छे कर्मों के कारण ही मिलते हैं। धन तो दुर्योधन के पास भी था लेकिन वह केवल राज्य के लोभ में सारी जिंदगी ईर्ष्या द्वेष के चक्रव्यूह में ही फंस कर रह गया और अपने साथ कितने लोगों का संहार करवा दिया।

      इस प्रकार रानी ने विचार किया कि राजा के मन में अभी केवल संसार की कामना ही बसी हुई है। अभी राजन परम तत्व ज्ञान के अधिकारी नहीं हैं। रानी का विवेक जाग्रत अवस्था में था इसलिए राजा के अनुकूल ही आचरण किया करती थी।

      साधना योग के द्वारा रानी ने विधिपूर्वक धारणा का आश्रय लेकर आकाश में स्वछंद घूमने एवं इच्छानुसार रूप धारण करने वाली सिद्धियों को प्राप्त कर लिया। इधर राजा को राज्य भोगते हुए कई वर्ष बीत गए। उन्होंने अनुभव किया कि विषय वासनाओं को भोगने की कामनायें बढ़ती जा रही है लेकिन चित्त को कहीं शांति नहीं मिलती। राजा ने राजपाठ त्याग कर वनों में जाकर तपस्या करने का निर्णय किया। इसके लिए रानी तैयार नहीं हुई। राजा आधी रात को राजमहल को छोड़कर वन की तरफ चल पड़े।

     कुछ समय व्यतीत हो जाने के बाद रानी आकाश मार्ग द्वारा उस तपोवन में पहुँची। महाराज शिखिध्वज शांत, पर उदास नजर आ रहे थे। तब रानी चूडाला ने एक ऋषि कुमार का रूप बनाया और राजा के सामने पहुँची। राजा ने ऋषि का अतिथि के रूप में सत्कार किया। यह सब हो जाने के बाद सत्संग प्रारंभ हुआ। रानी ने पूछा आप कौन हैं? राजा ने अपना परिचय देकर कहा कि मैं विषय विकारों से भयभीत होकर वनों में रहता हूं। मैं असहाय हो गया हूँ मुझे कोई रास्ता नहीं सूझता। आप मुझपर कृपा करें।

      ऋषि के रूप में चूडाला ने कहा कि जबतक अंत:करण में किए हुए कर्मों का प्रभाव बना रहता है तब तक शांति संभव नहीं है। कर्मों का नाश ज्ञान के द्वारा ही संभव है।

     तब ऋषि ने राजा को तत्वज्ञान की दीक्षा प्रदान की। उसे हृदय में ही प्रभु के प्रकाश रूप में दर्शन करवाए। तब ऋषि ने कहा कि अब आप अपने कर्तव्य का पालन करें। अपने राज्य का संचालन करें ताकि बाकी प्रजा का भी कल्याण हो। तब ऋषि का रूप बदल कर रानी चूडाला अपने वास्तविक रूप में आ गई। राजा रानी को देखकर हैरान रह गया। उसके बाद ज्ञानी दम्पत्ति नगर में लौट आए और शेष जीवन उन्होंने भक्ति करते हुए अपने राजमहल में पूर्ण किया।

    इस प्रकार जीवन का सच्चा आनंद तो आत्मज्ञान में ही है जिसके द्वारा मनुष्य के हृदय में सद्विचार उदय होते हैं।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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