**विषयों के भोगने की कामना उनके भोग से शान्त नहीं होती। आग में जितना घी डालो वह उतनी ही बढ़ती चली जाती है**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष का इन विषयों से संग बढ़ता है। फिर इस संग से वासना उत्पन्न होती है। विषयों की प्राप्ति की कामना बढ़ जाती है। और इस कामना में विघ्न पड़ने के कारण क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोध से अविवेक पैदा होता है और जब अविवेक पैदा हो जाता है तो मनुष्य यह भूल जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित? उचित अनुचित का निर्णय न कर सकने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। जिसकी बुद्धि का नाश हो जाता है उसका स्वयं भी नाश हो जाता है।

     महाभारत में राजा ययाति की कथा आती है। उसने भौतिक जगत के विषय भोगों का आनंद लेने के लिए अपने ही पुत्र की जवानी को माँग लिया। लेकिन कहते हैं कि विषयों को भोगने के पश्चात भी विषयों के प्रति उनकी आसक्ति में कमी न आई। कई वर्षों तक विषयों का भोग करने के पश्चात भी संतुष्टि न हुई तो वह कहते हैं -

     विषयों के भोगने की कामना उनके भोग से शांत नहीं होती। आग में जितना घी डालो वह उतनी ही बढ़ती चली जाती है। पृथ्वी में जितना भी अन्न, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं वह सब ही एक कामुक की कामना पूरी करने में भी असमर्थ हैं। इसलिए सुख उनकी प्राप्ति से नहीं बल्कि उनके त्याग से होता है। दुर्बुद्धि लोग तृष्णा का त्याग नहीं कर सकते। बूढ़े होने पर भी तृष्णा बूढ़ी नहीं होती। वह तो एक प्राणान्तक रोग है। इसी विषय में सहजोबाई कहती हैं -

'तृष्णावंत जगमें दुखी आठो पहर कंगाल।

जिन पाया संतोष धन ते जन मालामाल।।'

       अतः तृष्णा का त्याग करने पर ही सुख मिलता है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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