सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
यमाचार्य नचिकेता को समझाते हुए स्पष्ट करते हैं कि आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति मेरे द्वारा या किसी भी अन्य के द्वारा कहने या समझाने मात्र से नहीं हो सकती। यह आत्मा न तो प्रवचन करने मात्र से, न ही बुद्धि लड़ाने से और न ही उपदेशों को सुनने मात्र से प्राप्त हो सकती है। जिस किसी पर भी प्रभु की कृपा हो जाती है उनके जीवन में ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु आते हैं। उनकी कृपा से आत्मसाक्षात्कार के द्वारा अन्तर में ही उस परम तत्व के साक्षात दर्शन हो जाते हैं।
कठोपनिषद में यमाचार्य ने इस शरीर को एक रथ की संज्ञा देते हुए कहा है कि यह शरीर मानो एक रथ है। आत्मा इस रथ रूपी शरीर पर सवारी करने वाला बताया गया है। बुद्धि सारथी है जो इस रथ को हाँकने का कार्य करती है। मन लगाम है, जिसके द्वारा घोड़ों को काबू किया जाता है। अतः इन्द्रियाँ घोड़े हैं। संसार विषय है जिनकी ओर घोड़े इस रथ रूपी शरीर को ले जा रहे हैं। यदि रथ पर सवार रथी रूपी आत्मा अपने सारथी रूपी बुद्धि को आदेश दे और बुद्धि लगाम रूपी मन के द्वारा घोड़ों को लक्ष्य रूपी परमात्मा की ओर लेकर जाए तब तो जीव भोक्ता कहलाता है।
परंतु अक्सर जगत में यह यात्रा उल्टी ही नजर आती है। संत चरण दास जी कहते हैं -
'इन्द्रियन के बस मन रहे मन के बस रहे बुद्ध।
कहो ध्यान कैसे लगे ऐसा जहाँ विरुद्ध।।'
यह शरीर रूपी रथ मनुष्य को विषय विकारों की तरफ लिए जा रहा है। यदि दिशा विषयों की तरफ होगी तो समझाया गया है कि मनुष्य जैसा चिंतन करता है उन्हीं के अनुसार वह विषयों के प्रति आसक्त हो जाता है।
इसलिए भर्तृहरि ने कहा है -
"भोगो न भुक्ता वयमेव भुक्ता।"
हम विषयों को न भोग सके, अपितु विषयों ने ही हमारे जीवन को भोग लिया।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
