योगेश्वर भगवान् श्री कृष्ण ने कहा - अर्जुन!यज्ञ (परहितार्थ कर्म) के लिए किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों को करने वाला मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है, अर्थात् पाप-पुण्य, जन्म -मृत्यु और स्वर्ग -नरक में फंसता है। इस लिए अर्जुन! तू आसक्ति (लगाव, मोह) को छोड़ कर उस यज्ञ केलिए ही अच्छी तरह कर्तव्य कर्म (शास्त्रविहित कर्म,स्वकर्म, स्वधर्म आदि) कर।
कौंतेय! सृष्टि रचयिता ब्रह्मा ने कल्प(सृष्टि
) के शुरू में मनुष्य और यज्ञकर्म दोनो की रचना एक साथ की और कहा कि तुम सब इस यज्ञकर्म के द्वारा अपनी उन्नति करना और यह यज्ञकर्म तुम सबको मनचाहा भोग देने वाला होगा। तुमलोग इस यज्ञकर्म के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करना और वे प्रसन्न होकर तुम्हें मनचाहा भोग देंगे।इस तरह नि: स्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम सब परम कल्याण को पाओगे।यज्ञ के द्वारा उन्नत देवता तुम्हें विना मांगे ही इच्छित भोग अवश्य ही देते रहेंगे । अर्जुन! इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए हुए भोगों को जो मनुष्य उनको विना अर्पित किए भोगता है,वह चोर ही है क्योंकि वे भोग तो देवताओं से ही मिले हैं। अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो
पापी लोग अपना शरीर -पोषण करने केलिए ही अन्न पकाते हैं,वे तो पाप को ही खाते हैं –
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यंतेयज्ञभाविता:।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो
भुंक्ते स्तेन एव स:।।
यज्ञशिष्टाशिन:संतो
मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुंजते ते त्वघं पापा
ये पचंत्यात्मकारणात्।।–गीता ,
अध्याय ३, श्लोक १२-१३
प्रस्तुतकर्ता
डॉ .हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
