सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि उपनिषद और अद्वैत वेदान्त जब कहते हैं "जगत मिथ्या है", तो उसका अर्थ यह नहीं है कि जगत बिल्कुल नहीं है। यदि ऐसा होता, तो हम उसे अनुभव ही नहीं करते। "मिथ्या" का अर्थ है — जो प्रतीत तो होता है, परन्तु स्वयं में स्वतंत्र और परम सत्य नहीं है।
रस्सी में सर्प का भ्रम इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। सर्प दिखता है, भय भी उत्पन्न करता है, लेकिन उसका अस्तित्व रस्सी पर आश्रित है। ज्ञान होने पर सर्प का भ्रम मिट जाता है, रस्सी बनी रहती है।
इसी प्रकार अद्वैत कहता है:
ब्रह्म सत्य है।
जगत मिथ्या है।
जीव ब्रह्म ही है।
अब आपके प्रश्न पर आते हैं।
यदि जगत मिथ्या है, तो क्या शास्त्र, ईश्वर, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क भी मिथ्या हैं?
अद्वैत का उत्तर है — हाँ, परन्तु एक विशेष अर्थ में।
जब तक जीव अपने को शरीर-मन-बुद्धि मानता है, तब तक।
ईश्वर सत्य हैं,
शास्त्र सत्य हैं,
धर्म-अधर्म सत्य हैं,
पाप-पुण्य सत्य हैं,
स्वर्ग-नर्क सत्य हैं।
यह सब व्यवहारिक सत्य के स्तर पर मान्य हैं।
किन्तु जब ब्रह्मज्ञान हो जाता है और ज्ञानी अपने को शुद्ध चैतन्य रूप में जान लेता है, तब द्वैत का सम्पूर्ण ढाँचा विलीन हो जाता है। तब न साधक रहता है, न साधन, न साध्य।
इसी भाव को माण्डूक्य उपनिषद् और गौड़पाद कारिका में अत्यन्त स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है कि परम दृष्टि से न बन्धन है, न मोक्ष, न साधक है, न मुक्त।
लेकिन यहाँ एक बड़ी सावधानी है।
यदि कोई व्यक्ति केवल बौद्धिक रूप से कह दे कि "सब मिथ्या है, इसलिए पाप-पुण्य भी मिथ्या हैं", तो यह वेदान्त नहीं, आत्मवंचना है।
क्यों?
क्योंकि जो व्यक्ति भूख, अपमान, लाभ, हानि, सुख, दुःख को वास्तविक अनुभव करता है, वह अभी व्यवहारिक जगत में ही स्थित है। उसके लिए धर्म-अधर्म भी उतने ही वास्तविक हैं।
जब तक सर्प का भय बना है, तब तक रस्सी का ज्ञान नहीं हुआ है। और जब रस्सी का ज्ञान हो गया, तब सर्प के विषय में चर्चा ही समाप्त हो जाती है।
अतः अद्वैत का निष्कर्ष यह नहीं है कि "कुछ भी मत मानो", बल्कि यह है कि--
> शास्त्र, ईश्वर, गुरु, साधना, धर्म, पाप-पुण्य — ये सब उस नाव के समान हैं जो जीव को अज्ञान के तट से ज्ञान के तट तक पहुँचाते हैं।
पार पहुँच जाने पर नाव का प्रयोजन समाप्त हो जाता है, किन्तु नदी पार करने से पहले नाव को मिथ्या कहकर छोड़ देना मूर्खता है।
यही कारण है कि आदि शंकराचार्य स्वयं अद्वैत के सर्वोच्च प्रतिपादक होते हुए भी ईश्वर-भक्ति, शास्त्र-अध्ययन, धर्माचरण और उपासना पर अत्यन्त बल देते हैं।
इसलिए प्रश्न का अंतिम उत्तर यह है--
परमार्थिक दृष्टि से शास्त्र, ईश्वर, जीव, जगत, पाप, पुण्य, स्वर्ग, नर्क—सब नाम-रूपात्मक उपाधियाँ हैं और केवल ब्रह्म ही सत्य है।
किन्तु व्यवहारिक दृष्टि से ये सब सत्य हैं, और इन्हीं के माध्यम से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है।
यही अद्वैत का अद्भुत संतुलन है- न जगत को पूर्णतः अस्वीकार करता है, न उसे परम सत्य मानता है। जगत को साधन मानता है, साध्य नहीं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
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