सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी।
जीवन का प्रश्न यह नहीं कि रथ कितना सुंदर है; प्रश्न यह है कि उसका सारथी जागृत है या नहीं।
कठोपनिषद् हमें धीरे-धीरे बाहर से भीतर की ओर लाता है।
हमने समझा—
विषय → इन्द्रियाँ → मन → बुद्धि → आत्मा।
यमराज इसी क्रम को एक अत्यंत सुंदर रूपक में समझाते हैं।
यह है—
रथरूपक।
यमराज कहते हैं—
आत्मानं रथिनं विद्धि
शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि
मनः प्रग्रहमेव च॥
(कठोपनिषद् १.३.३)
भावार्थ
"आत्मा को रथी समझो, शरीर को रथ समझो, बुद्धि को सारथी और मन को लगाम समझो।"
चार शब्दों में पूरा मनुष्य समझा दिया गया—
आत्मा — रथी
शरीर — रथ
बुद्धि — सारथी
मन — लगाम
लेकिन अभी रूपक पूरा नहीं हुआ।
यमराज आगे कहते हैं—
इन्द्रियाणि हयान्याहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥'
(कठोपनिषद् १.३.४)
अर्थात्—
इन्द्रियाँ घोड़े हैं और विषय उनके मार्ग हैं। आत्मा जब शरीर, इन्द्रियों और मन से संयुक्त होकर अनुभव करती हुई प्रतीत होती है, तब ज्ञानीजन उसे भोक्ता कहते हैं।
अब इस पूरे रथ को समझिए।
१. आत्मा — रथी
रथ में बैठा हुआ व्यक्ति स्वयं रथ नहीं होता।
उसी प्रकार आत्मा शरीर नहीं है।
शरीर केवल उसका वाहन है।
हम कहते हैं—
"मेरा शरीर।"
इस वाक्य में एक गहरा सत्य छिपा है।
यदि शरीर "मेरा" है, तो "मैं" शरीर से अलग हूँ।
लेकिन अज्ञान के कारण हम भूल जाते हैं और कहते हैं—
"मैं शरीर हूँ।"
यहीं से जीवभाव प्रारम्भ होता है।
२. शरीर — रथ
शरीर रथ है।
रथ आवश्यक है क्योंकि उसके बिना यात्रा नहीं हो सकती।
इसी प्रकार आत्मा के अनुभव और कर्म के लिए शरीर एक साधन है।
इसलिए शरीर की उपेक्षा भी ज्ञान नहीं है।
शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है।
लेकिन शरीर को ही अपना अंतिम स्वरूप मान लेना अज्ञान है।
शरीर साधन है, साध्य नहीं।"
३. बुद्धि — सारथी
अब सबसे महत्वपूर्ण भाग।
रथ का संचालन कौन करता है?
सारथी।
उसी प्रकार जीवन का संचालन बुद्धि को करना चाहिए।
बुद्धि का कार्य है—
- सही और गलत का निर्णय,
- उचित और अनुचित का विवेक,
- दीर्घकालिक परिणामों को देखना,
- मन और इन्द्रियों को दिशा देना।
यदि बुद्धि जागृत है, तो जीवन सही दिशा में चलता है।
यदि बुद्धि सो गई, तो मन और इन्द्रियाँ रथ को जहाँ चाहें वहाँ ले जाएँगी।
४. मन — लगाममन का काम क्या है?
मन इन्द्रियों और बुद्धि के बीच का माध्यम है।
बुद्धि कहती है—
"यह उचित है।"
मन कहता है—
"लेकिन मुझे यह पसंद नहीं।"
बुद्धि कहती है—
"इसे अभी छोड़ दो।"
मन कहता है—
"नहीं, मुझे अभी चाहिए।"
इसलिए मन लगाम है।
लगाम मजबूत और नियंत्रित होगी तो घोड़े नियंत्रित रहेंगे।
लगाम कमजोर होगी तो रथ अनियंत्रित हो जाएगा।
५. इन्द्रियाँ — घोड़े
यमराज कहते हैं—
"इन्द्रियाणि हयान्याहुः।"
इन्द्रियाँ घोड़ों के समान हैं।
आँख दृश्य की ओर दौड़ती है।
कान ध्वनि की ओर।
जिह्वा स्वाद की ओर।
नाक गंध की ओर।
त्वचा स्पर्श की ओर।
हर इन्द्रिय अपने-अपने विषय की ओर खिंचती है।
यदि इन्हें खुला छोड़ दिया जाए, तो वे रथ को अलग-अलग दिशाओं में खींचेंगी।
यही मनुष्य की सामान्य स्थिति है।
६. विषय — घोड़ों के मार्ग
इन्द्रियों के विषय हैं—
रूप,
रस,
गंध,
शब्द,
स्पर्श।
यमराज इन्हें गोचर कहते हैं।
जिस प्रकार घोड़े रास्ते पर दौड़ते हैं, वैसे ही इन्द्रियाँ अपने विषयों की ओर दौड़ती हैं।
समस्या विषयों में नहीं है।
समस्या यह है कि—
क्या घोड़े नियंत्रित हैं?
जब बुद्धि जागृत नहीं होती
कल्पना कीजिए—
रथ अच्छा है।
घोड़े शक्तिशाली हैं।
लेकिन सारथी सो रहा है।
लगाम हाथ में है, पर नियंत्रण नहीं।
तो क्या होगा?
रथ दुर्घटना का शिकार होगा।
यही मनुष्य का जीवन है।
शरीर स्वस्थ हो सकता है।
इन्द्रियाँ शक्तिशाली हो सकती हैं।
मन इच्छाओं से भरा हो सकता है।
लेकिन यदि बुद्धि विवेकहीन है, तो जीवन दिशाहीन हो जाता है।
आज का मनुष्य और रथरूपक
आज यह रूपक पहले से भी अधिक प्रासंगिक है।
मान लीजिए—
मोबाइल सामने आया।
आँख ने देखा।
मन आकर्षित हुआ।
बुद्धि ने कहा—
"समय नष्ट मत करो।"
मन ने कहा—
"बस पाँच मिनट।"
पाँच मिनट एक घंटे में बदल गए।
यह क्या हुआ?
घोड़े दौड़े और सारथी हार गया।
यही इन्द्रियनिग्रह की समस्या है।
सफल जीवन का रहस्य
कठोपनिषद् का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—
इन्द्रियों को नष्ट मत करो।
उन्हें नियंत्रित करो।
मन को दबाओ मत।
उसे प्रशिक्षित करो।
बुद्धि को दबने मत दो।
उसे विवेकपूर्ण बनाओ।
तभी जीवन की यात्रा सही दिशा में जाएगी।
"संयम का अर्थ इन्द्रियों को रोक देना नहीं; उन्हें सही दिशा में चलाना है।"
आध्यात्मिक साधना और रथ
इस रूपक को साधना से जोड़ें—
शरीर → आसन और स्वास्थ्य से संतुलित।
इन्द्रियाँ → संयमित।
मन → शांत और एकाग्र।
बुद्धि → विवेकपूर्ण।
आत्मा → साक्षी।
तब जीवन की यात्रा भीतर की ओर मुड़ती है।
और यही कठोपनिषद् का उद्देश्य है।
एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक बात
यहाँ "आत्मा रथी है" कहने का अर्थ यह नहीं कि आत्मा वास्तव में कोई यात्री है जो एक शरीर से दूसरे शरीर तक भौतिक रूप से यात्रा करती है।
यह व्यवहारिक स्तर का रूपक है।
अद्वैत वेदान्त की परम दृष्टि से आत्मा स्वयं न आती है, न जाती है।
गति जीवभाव और उपाधियों की है।
आत्मा तो सदा साक्षी है।
रथरूपक हमें साधना के स्तर पर यह समझाता है कि जब तक शरीर-मन-बुद्धि के साथ हमारा व्यवहार है, तब तक इनका उचित संचालन आवश्यक है।
मुख्य विचार
शरीर हमारा साधन है, अंतिम पहचान नहीं।
इन्द्रियाँ शक्तिशाली घोड़ों की तरह हैं।
मन उनका नियंत्रण करने वाली लगाम है।
बुद्धि सारथी है और उसका जागृत होना आवश्यक है।
आत्मा रथी के समान साक्षी है।
जीवन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि बुद्धि मन और इन्द्रियों का संचालन कितनी कुशलता से करती है।
"जिसकी बुद्धि जागृत है, मन नियंत्रित है और इन्द्रियाँ संयमित हैं, वही जीवन-रूपी रथ को परम लक्ष्य तक पहुँचा सकता है।"
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
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