भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा –अर्जुन! संसार के सभी प्राणीअपनेस्वभाव(प्रकृति, आदत)के परवश हुए कर्म करते हैं। बुद्धिमान् मनुष्य भी अपने भाव(स्वभाव , प्रकृति,अपने विचार) के अनुसार क्रिया -प्रतिक्रिया करते हैं।फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा? पार्थ!पंच ज्ञानेंद्रियों(नेत्र,कान आदि) के पंच विषयों (रुप,शब्द आदि)में राग तथा द्वेष हैं। अतः मनुष्य को इन दोनों महान् शत्रुओं के वश में नहीं होना चाहिए। भारत! अच्छी तरहआचरण
में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म बहुत सुंदर और अच्छा है। अपने धर्म में तो मरना भी हितकारी है और दूसरे का धर्म भयावह और बहुत हानिकारक है।–
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपंथिनौ।।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण:परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय:परधर्मो भयावह:।।–
गीता, अध्याय ३, श्लोक ३४-३५
प्रस्तुतकर्ता
डॉक्टर हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
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