**ईश्वर के साम्राज्य में तर्क, बुद्धि, शाब्दिक ज्ञान का कोई लाभ नहीं है। परमात्मा को मात्र साक्षात्कार द्वारा ही जाना जा सकता है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी।

आध्यात्मिक जिज्ञासु जितना अधिक तर्कों व व्याखानों द्वारा परमात्मा को जानने का प्रयास करता है, वह उतना ही उलझता चला जाता है। उसका मन मस्तिष्क सूचनाओं का दलदल बन जाता है, जिसमें अंततः वह स्वयं ही फंस जाता है। तभी तो महापुरुषों ने मानव जाति को सचेत करते हुए उद्घोष किया-- "शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणकारणम"! अर्थात शब्दों का जाल ऐसा घना जंगल है, जिसमें व्यक्ति का चित्त भ्रमित हो जाता है।

महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने व्यक्त किया-- "मैंने जितना अधिक पढ़ा, उतना ही ज्यादा मैं उलझ गया - सृष्टि की व्यवस्था और मानवीय मस्तिष्क की उलझनों में तथा वैज्ञानिकों द्वारा सृष्टि के संदर्भ में उठाए गए 'क्यों, कब और कैसे' प्रश्नों में!"

पूर्ण संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का कहना है--'ईश्वर के साम्राज्य में तर्क, बुद्धि, शाब्दिक ज्ञान का कोई लाभ नहीं है। वहाँ तो मूक बोलते हैं, नेत्रहीन देखते हैं और बधिर सुनते हैं।' परमात्मा को मात्र साक्षात्कार द्वारा ही जाना जा सकता है।

एक मधुमक्खी तब तक पुष्प के चारों ओर चक्कर लगाती है- जब तक कि वह पुष्प के अंदर बैठकर उसके मधुर रस का आनंद नहीं ले लेती है! इस रस को पाते ही वह शांत व स्थिर हो जाती है। ठीक इसी प्रकार हमलोग भी तब तक विभिन्न मतों व तर्कों मे उलझे रहते हैं, जब तक कि ईश्वर की अनुभूतियों का आनंद नहीं प्राप्त कर लेते।

अतः जिस क्षण हम अपने अंतःकरण मे परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं, उसी समय हमारी उत्तेजना और बेचैनी समाप्त हो जाती है।सभी प्रश्नों का समाधान मिल जाता है।

*ओम् श्री आशुतोषाय नमः*

"श्री रमेश जी"

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।




Post a Comment

Previous Post Next Post