सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी।
यदि किसी व्यक्ति का मत है कि ईश्वर का दर्शन नहीं किया जा सकता। ईश्वर तो केवल कल्पना का विषय है।तो यह सार्वभौमिक सत्य नहीं बन जाएगा। यह उसका दुर्भाग्य है कि उसके जीवन में कोई ऐसे पूर्ण सदगुरु नहीं आए, जो ईश्वर का साक्षात्कार करा सकें।क्योंकि सभी ग्रंथ शास्त्र एक स्वर में कहते हैं कि सदगुरु के मार्गदर्शन में मनुष्य अपने भीतर प्रकाश स्वरूप परमात्मा का दर्शन कर सकता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि- सच्चे सदगुरु पानी के समान होते हैं, जिसमें चावलों को साफ किया जाता है। इस पानी में सांसारिक मनुष्य की ईश्वर के प्रति मिथ्या धारणाओं, भ्रमों रूपी गंदगी को साफ कर उसे पावन पवित्र, निर्मल रूप देने की अथाह क्षमता होती है।
आज हर ओर लोग अपूर्ण गुरुओं का अंधानुकरण करते पाए जाते हैं। जहाँ भी अनुयायियों की संख्या ज्यादा दिखी, उसी की ओर भेड़ चाल शुरु हो जाती है।यह तक भी जानने का प्रयास नहीं किया जाता कि स्वयं को गुरु कहने वाला वह व्यक्ति शास्त्र ग्रंथों द्वारा परिभाषित पूर्ण गुरु की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं! आइंस्टीन ने सटीक कहा था- What is right is not always popular and what is popular is not always right.
अर्थात जो सही है, वह हमेशा लोकप्रिय नहीं होता और जो लोकप्रिय है, वह सदा सही नहीं होता।
किंतु आज के दौर में समाज आँखें मूंदकर लोकप्रियता के पीछे दौड़ रहा है। यही कारण है कि वर्तमान में ऐसी अनेक घटनाएं पढ़ने और सुनने को मिलती हैं, जहाँ अनुयायियों की भावनाएं कुचली जाती हैं। ऋषि मनीषियों ने पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु की पहचान को ग्रंथों में अंकित किया--
'अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नम:।।'
अर्थात अखंड परमात्मा जो संपूर्ण ब्रह्मांड में समाविष्ट है, चर अचर सभी मे समाया हुआ है, कण कण मे व्याप्त है- जो इस परम तत्व का दर्शन करवा दे, वही पूर्ण सदगुरु हैं। उनको नमन है।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस व्यक्त करते हैं- 'यदि कोई व्यक्ति उच्च श्रेणी का वक्ता है या धर्मोपदेशक है, पर आध्यात्मिक अनुभव देने मे वह शून्य है, तो उसका अनुसरण कदापि नहीं करना चाहिए।'
अत:अंधानुकरण से नहीं, बल्कि शास्त्रीय वाणियों को आधार बनाकर अपनी दिशा, अपना गुरु निर्धारित करें।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
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