सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
कहते हैं न, इस दुनिया में आप सबसे सब कुछ छिपा सकते हैं, पर दो लोगों से कभी नहीं छिपा सकते - एक खुद की आत्मा से और दूसरे परमात्मा से।
हम लाख पर्दे डाल लें, अंधेरे में छिपकर कोई कर्म कर लें और सोचें कि किसी ने नहीं देखा। दुनिया की नज़रों से शायद हम बच जाएं, पर हमारी चेतना सब देख रही होती है। वह हर कर्म का हिसाब रखती है।
यही कारण है कि आज हम खुद से प्रेम नहीं कर पाते। अकेले में अपने साथ दो पल बैठने से डरते हैं। मन में एक अजीब सी बेचैनी, एक ग्लानि बनी रहती है। यह ग्लानि का बोझ ही है जो हमारी आत्मा को बोझिल बनाए रखता है।
जब तक यह बोझ है, तब तक जीवन में सच्चा प्रेम, सम्मान और आत्मविश्वास पैदा नहीं हो सकता। हम अक्सर सोचते हैं कि लोग हमारे साथ ऐसा क्यों करते हैं? पर सत्य यह है कि इसके लिए बहुत हद तक हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। जैसा हमारा भीतर होगा, वैसी ही हमारी बाहर की दुनिया बनेगी।
*तो समाधान क्या है? समस्या से भागना नहीं, जागना है।*
*1. पश्चाताप:* जो हो गया, उसे स्वीकार कीजिए। सच्चे मन से उसका पश्चाताप कीजिए। पश्चाताप अग्नि है जो पुराने कुकर्मों को भस्म कर देती है।
*2. आत्म-जागृति:* इसके लिए सबसे पहले आत्मिक रूप से जागृत होना पड़ेगा। पूर्ण गुरु से ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेकर आत्म-जागृति को प्राप्त करना होगा। जब भीतर का दीया जलता है, तो भीतर का सारा अंधकार मिट जाता है।
*3. स्वयं का नव-निर्माण:* साधना, सुमिरन और सेवा द्वारा नए सुकर्म करके स्वयं का निर्माण कीजिए।
जब आप ऐसा करेंगे, तब आपके भीतर खुद के लिए प्रेम, सम्मान, आत्मबल और आत्मविश्वास जन्म लेगा। और आपके इस ओज के सामने समाज को भी नतमस्तक होना पड़ेगा।
इसलिए दूसरों को दोष देना छोड़िए, स्वयं को बदलिए। क्योंकि जब आप बदलते हैं, तो जगत अपने आप बदल जाता है।
*ॐ श्री आशुतोषाय नमः*
श्री सियाबिहारी जी ✍️
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