मानव शरीर के तीन भाग हैं -
१-स्थूल शरीर–यह पांच महाभूतों से बना शरीर सबको दिखाई देता है। हर क्षण इसका क्षरण या नाश होता रहता है।
२-सूक्ष्म शरीर(लिंग शरीर)-यह किसी को दिखाई नहीं देता है। इसमें १८तत्त्व हैं–
पांच ज्ञान इंद्रियां,पांच कर्म इंद्रियां,पांच विषय,मन, बुद्धि तथा चित्त।
वास्तव में यही १८तत्त्व करण,कर्ता और भोक्ताहैं, इन्ही का स्वर्ग,नरक और मोक्ष होता है,परन्तु प्रकृति(माया,अविद्या, अज्ञान आदि) से एकरुपता( तादात्म्य)
स्थापित होने से अपने असल स्वरुप (ईश्वरांश,शाश्वत,आत्मा,नित्य, अजन्मा,विभु,सर्वज्ञ,अभोक्ता आदि) को भूलकर आत्मा अहंकारवश जीव(जन्मने और मरनेवाला), जीवात्मा,अल्पज्ञ,कर्ता, भोक्ता आदि बनकर पाप-पुण्य का कर्ता और सुख -दु:ख का भोक्ता बना हुआ है।
३–कारण शरीर–मनुष्य या प्राणी का जैसा अच्छा -बुरास्वभाव (प्रकृति,किए गए कर्म का प्रभाव (संस्कार) ) होता है वैसा फल (परिणाम) होता है–
१-अच्छी/बुरी योनियों में जन्म
२-एक नियत आयु तथा
३-अच्छे-बुरे किए गये कर्मों के अनुसार स्वर्ग/नरक के भोग।
मन, वाणी और कर्म से कृत पुण्य(कुशल, शुक्ल,शुभ,इष्ट आदि)कर्म,पाप(अकुशल, कृष्ण,अशुभ, अनिष्ट आदि)कर्म तथा पुण्य-पापमिश्रितकर्म त्रिविध होते हैं –
1-संचित कर्म
२-प्रारब्ध कर्म तथा
३-क्रियमाण कर्म ।
मनुष्य या प्राणी का त्रिविध रुप है -
१-व्यक्तिरुप(जन्म रुप)
२-स्थितिरुप(जीवन) तथा
३-अव्यक्तिरुप(मृत्यु रुप)।
१–व्यक्तिरुप- पूर्व जन्म में कृत प्रारब्ध कर्मानुसार भोग केलिए सूक्ष्मशरीर का स्थूल शरीर धारण करना जन्म (व्यक्ति,दृश्य, Appearenceआदि) है।
२–स्थितिरुप–स्थूलशरीर में जबतक प्रारब्ध कर्म भोग केलिए जीवात्मा से ऊर्जाप्राप्त सूक्ष्म शरीर क्रिया शील रहता है तब तक जीवन कहलाता है।
३–अव्यक्तिरुप–स्थूल शरीर से प्रारब्ध कर्म भोग खत्म होते ही सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर का त्याग ही मृत्यु (अदृश्य,
अव्यक्ति, Disappearenceआदि) है।
जैसे निर्लिप्त गंधहीन वायु स्थान से सुगंध या दुर्गंध लेकर आगे बढ़ जाती है वैसे ही
निर्लिप्त और असंग जीवात्मा पुराने स्थूल
शरीर को छोड़ कर मन, बुद्धि आदि सूक्ष्म शरीर के साथ प्रारब्ध कर्मानुसार नये शरीर को धारण करता है।
प्रस्तुतकर्ता
डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
