मैं जीवन का एक पथिक हूं ,रुकना मेरी रीत नहीं।

 

                  गोष्ठी में पधारे वरिष्ठ साहित्यकार जन 

भागीरथी सांस्कृतिक मंच, गोरखपुर की 822वी काव्य गोष्ठी दशहरा के शुभ अवसर पर संस्था के मुख्य संरक्षक श्री अरविंद शर्मा जी के माया इंटरप्राइजेज के शोरूम पर आयोजित की गई।

कार्यक्रम  की अध्यक्षता वरिष्ठ भोजपुरी गीतकार श्री वागीश्वरी प्रसाद मिश्र "वागीश" जी ने की व सफल संचालन संस्था सचिव युवा कवि कुन्दन वर्मा 'पूरब' जी ने किया।

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ भाई दयानंद त्रिपाठी "व्याकुल' जी द्वारा प्रस्तुत वाणी वंदना से हुआ।

तत्पश्चात युवा कवि सुधाकर साहनी ने मां की बात इन शब्दों में बयां की -

मां के आंचल जैसा आवरण नहीं देखा,

उसके कष्टों का कोई निवारण नहीं देखा।

अपना जीवन हवन कर देती है मां ,

 उसके प्यार के जैसा व्याकरण नहीं देखा।

युवा कवयित्री डॉ. सरिता सिंह जी ने मन के रावण के अंत की बात अपने इस मुक्तक में की --

रावण के पुतले से पहले खुद में खुद का रावण मारों,

अपने अंतर्मन में झांको खुद में खुद का मानव तारो।

अपना अहम उतार के फेंको तब जाकर तुम राम बनोगे,

मान रखो मर्यादा का, एक पुरुष निष्काम बनोगे।

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ भोजपुरी कवि वागीश्वरी प्रसाद मिश्र"वागीश"  जी सभी कवियों को आशीष देते हुए वृद्धावस्था की कठिनाइयों का वर्णन अपने गीत में किया, उसकी एक पंक्ति देखिए -

फेक देहली थरिया परोस के दुआरी,

बुढ़वा ससुर के सतावे लगली गारी।

आए हुए कवियों के प्रति आभार करते हुए संस्था संरक्षक श्री अरविंद शर्मा जी ने अपनी बात इन पंक्तियों में कहीं -

 मैं जीवन का एक पथिक हूं ,रुकना मेरी रीत नहीं।

हार मान लूं जीवन से,मैं ऐसा भी मजबूर नहीं।।

अन्य जिन कवियों ने काव्य पाठ किया उनके नाम हैं - सर्वश्री अवधेश शर्मा 'नंद' , अरविंद 'अकेला', डॉ. सत्य नारायण 'पथिक' , कुन्दन वर्मा 'पूरब' , दानिका प्रसाद विश्वकर्मा, दिनेश गोरखपुरी , दयानंद त्रिपाठी 'व्याकुल' , बद्री विश्वकर्मा 'सांवरिया' ,  रत्नेश 'सृजन' आदि।

श्रोताओं  में उपस्थित रहे डॉ. अमिताभ शर्मा, प्रेम प्रकाश शर्मा, आनंद शर्मा,डॉ. एस.एन. विश्वकर्मा एवं परिवारीजन।

1 Comments

  1. वागीश जी के घर पर काव्यपाठ करने का सौभाग्य मुझे भी मिला है,उनका घर काफी अच्छा है।वह स्वस्थ एवं प्रसन्न रहे यही मेरी प्रार्थना है।

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