*कौन कहता है मंदिरों में जाति पूछी जाती है ?
जाति मंदिरों में नहीं पूछी जाती !
बल्कि संशोधित संविधान में पूछी जाती है,जब कि मूल संविधान में जातिवाद का उल्लेख नहीं है।
सरकारी नौकरी में पूछी जाती हैं, राशन, स्कालरशिप और हर संस्थानों में पूछी जाती है।
फिर कौन हैं जो मंदिरो पर आरोप लगाते हैं ।
"ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण और शूद्र का बेटा शूद्र ही रहेगा, यह बात "मनुस्मृति" नही, बल्कि भारतीय संविधान का "जाति प्रमाण पत्र" कहता है !"
बाकी सनातन धर्म में तो व्यास, वाल्मीकि, रविदास को भी ब्राह्मण तथा संत की श्रेणी में रखा गया था।
वैसे तो ब्राह्मणों ने जातियाँ बनाई नही है।
ये खुद समय के साथ अपने आप बन गई है। लेकिन मान लिया कि उन्होंने ही बनाई है तो फायदा किसका हुआ?
ब्राह्मणों ने पूरा फर्नीचर व्यवसाय बढ़ई को दिया।
रियल सेक्टर कुम्हार को दिया।
लेदर का व्यवसाय चर्मकार को दिया।
डिलीवरी का व्यवसाय भी चर्मकार को दिया।
दूध का व्यवसाय यादव को दिया।
टेक्सटाइल का दर्जी को दिया।
हथियार का व्यवसाय लुहार को दिया।
बर्तन का ठठेरे को दिया । *पत्तल का बारी को दिया।
सूप का धरिकार को दिया।
चूड़ी व्यवसाय मलिहार को दिया।
मीट का खटीक को दिया।
फूल का माली को दिया।
तेल का व्यवसाय तेली को दिया।
जिससे सबको रोजगार मिला।
और इसी वजह से भारत पूरी दुनिया में सोने की चिड़िया था।
इन सारे सम्मानित व्यवसाइयों को आज संविधान ने पिछड़ा अछूत बना दिया है।
क्षत्रियों को वो काम दिया जिससे जवानी में औरतें विधवा और बच्चे अनाथ हो जाते हैं, जो कोई भी नहीं करना चाहेगा अपने लिए भिक्षा माँगना और अध्यापन रखा।
क्षत्रियों के हिस्से में बलिदान आया और स्वयं ब्राह्मणों के हिस्से में भिक्षाटन आया तो फिर जाति व्यवस्था में अन्याय कैसे किया ?
*ओम् श्री आशुतोषाय नमः।*
*श्री रमेश जी*
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