किसी वस्तु की शक्ति (गुण, धर्म आदि) किसी श्रद्धा (आदर, जानकारी आदि)की अपेक्षा (चाह आदि) नहीं करती। जैसे जोअग्नि जिस लकड़ी से उत्पन्न होती है, वही लकड़ी सम्पर्क में आ जाने पर वही अग्नि अपनी दाहशक्ति से उसे जला देती है। किसी तलवार की धार तलवार वाले की अंगुली और गैर की अंगुली में भेद नहीं करती बल्कि जोभी अंगुली संपर्क में आती है उस अंगुली को काट देती है।
विष या अमृत को जानकर/अनजाने/प्रेम से/घृणा से/आंखें मूंद कर/आंखें खोल कर/दिन में/रात में/सोकर/जागकर/पवित्र होकर/गंदे किसी भी तरह पीने पर विष या अमृत अपनी शक्ति (गुण/धर्म) पीने वाले पर दिखा ही देगा।
इसी तरह भगवान् का नाम- संकीर्तन भी
किसी भी तरह नाम -संकीर्तन करने वाले पुरुष कोअपनी शक्ति (गुण/धर्म) से प्रभावित करता ही है।
प्रस्तुतकर्ता
डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
