सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                *अखण्ड ज्ञान*

             श्री आर सी सिंह जी रिटायर्ड एयरफोर्स ऑफिसर
मनुष्य के एक तरफ संसार है और दूसरी ओर परमात्मा। आप संसार के जितना जितना करीब जाएंगे, संसारी लोगों की संकीर्णता का पता चलता जाता है। दूसरी ओर हम परमात्मा के जितना जितना करीब जाते हैं, परमात्मा की विशालता का एहसास होने लगता है। परमात्मा के करीब जाने का उपाय ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करना है। फिर भी सामान्य मनुष्य अक्सर गलत दिशा का चुनाव कर लेता है। सचमुच यह चिंतन का विषय है।

    प्रकृति के तीन गुण सतोगुण, रजोगुण व तमोगुण हैं। सतोगुण यानी भगवान का चिंतन होने मात्र से मन सतयुग में आ जाता है। सतोगुण + रजोगुण का चिंतन मन को त्रेतायुग में। रजोगुण + तमोगुण का चिंतन द्वापरयुग में। और केवल तमोगुण का चिंतन हमारे तन और मन को कलयुग में ले आता है।हम सभी मनुष्यों की दिनचर्या में कौन सा गुण मौजूद रहता है, आप स्वयं जानते हैं। अगर हमें मानव जीवन को सार्थक करना है, तो हमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते रहना चाहिए। 

    प्रकृति के लगभग सभी साधारण मनुष्यों की विषय भोगों में रुचि बनी ही रहती है। फिर निरंतर विषय भोगों को भोगने वाला इंसान प्रमाद रूपी प्रकोप से बच नहीं सकता। फिर प्रमाद धीरे-धीरे आलस्य और मोह को जन्म देता है, जो हमें तमोगुण की गहरी खाई में लाकर गिरा देता है। फिर यह तमोगुण ही हमें अध्यात्म में जुड़ने से रोकता है। इसलिए हमें आरंभ से ही अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति को अधिक महत्व देते हुए ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते रहना चाहिए।

*ओम् श्री आशुतोषाय नमः*

RC Singh.7897659218.

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