सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीसनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार - ये चारों मुनि सनकादिक के नाम से विख्यात हुए। वे ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। देवता भी सनकादिक का बहुत आदर करते थे। वे समय-समय पर ब्रह्मा जी का सत्संग कर उनसे और अधिक ज्ञान प्राप्त करने को तत्पर रहा करते थे। एक दिन सनकादिक ऋषियों ने संशय वश अपने पिता ब्रह्मा जी से प्रश्न किया, संसार विषय विपत्तियों के घर हैं। सांसारिक ऐश्वर्य और भोग विलास मानव की अशांति और पतन के कारण हैं। यह जानते हुए भी मनुष्य उनके भोग में क्यों लिप्त रहता है? उसे सांसारिक लगाव से मुक्त करने का क्या उपाय हो सकता है? ब्रह्मा जी अचानक किए गए इस प्रश्न का उपयुक्त उत्तर नहीं दे पाए। उन्होंने भगवान विष्णु का स्मरण कर उनसे सनकादिक मुनियों की जिज्ञासा का समाधान करने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि इंद्रियों के विषयों का चिंतन और विषयों में आसक्ति कभी नहीं करनी चाहिए। क्योंकि शरीर क्षणभंगुर है, उसे महत्व ना देकर आत्मचिंतन करने में ही कल्याण है। भगवान का निरन्तर चिंतन करते रहने से सांसारिक मोह माया से बचा जा सकता है। सनकादिक ने उनसे ज्ञान प्राप्त किया और असंख्य जीवो को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
