सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीभौतिक प्रकृति के सभी जीवों के पास मन-बुद्धि होते हैं। मन को सदा बुद्धि के अधीन रखना चाहिए, ताकि मन विषय भोगों की गलियों में आवारागर्दी करने से बच सके। क्योंकि भोगों में लिप्त मन परमात्मा का चिंतन नहीं कर सकता, अर्थात भोगों से वैराग बनाना ही होता है। देखिए, हम सबके जीवन में अक्सर अस्थाई वैराग्य श्मशानघाट में ही आता है। जबकि स्थाई वैराग्य जितने अंश में होगा, फिर उतने ही अंश में लिया हुआ ज्ञान मन में टिकता है। फिर टिका हुआ ज्ञान ही मन को प्रभु भक्ति में लगाता है। अन्यथा जीवन में अधिकतर कर्मकाण्ड होते ही दिखाई देते हैं, जिनसे कोई विशेष आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती।
जीवन में मृत्यु का एहसास रखें और मृत्यु में जीवन का। मृत्यु तो एक विश्राम स्थल है। विश्राम किया और यात्रा सिलसिला फिर शुरु। ये लक्षण योगी के होते हैं। अतः आप भी योगी बनें। मन में यह शाश्वत सत्य धारण करके ही योगी बना जा सकता है। जब पाने की खुशी तथा खोने का गम न हो तभी वैराग्य भाव कहा जा सकता है। जुड़ाव से न जुड़ना वैराग्य है। जग में रहें, परंतु कमल की भांति। जो कीचड़ का आधार पाकर भी सदैव विकासोन्मुख रहता है। उसकी दृष्टि सदैव सूर्य के प्रकाश से जुड़ी रहती है। फलतः कीचड़ उसे मैला नहीं कर पाती। यही योगी का लक्षण है।
अतः जीवन में सत्य अपनाएं और उसे जीने योग्य बनाएं।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
