चैरासी लाख योनियों में उत्थान दिलवाने वाली यह मानव देह ही कल्याणकारी है। *सुश्री कालिंदी भारती जी*

                प्रथम दिवस श्रद्धालुओं को संबोधित 
        करती करती हुई साध्वी सुश्री कालिंदी भारती जी

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा गोरखपुर निवासियों को अध्यात्म, विज्ञान व भक्ति रस के आनंद से परिचित करवाने के लिए आयोजित किए जा रहे श्रीमद्भागवत कथा साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ से पूर्व भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में बड़ी संख्या में सौभाग्यवती महिलाएँ पीताम्बर वस्त्रों में कलश लेकर चली। असंख्य सौभाग्य शाली स्त्रियों ने अपने सिर के ऊपर कलश धारण किए और भागवत कथा का संदेश सर्वत्र वितरित करते हुए व विश्व शांति की कामना का प्रचार, प्रसार करते हुए कथा स्थल पहुंचीं। तत्पश्चात् श्रीमद्भागवत महापुराण का पूजन किया गया। कथा व्यास साध्वी सुश्री कालिंदी भारती जी ने बताया कि हमारे शास्त्रों में आता है कि कलश के अग्रभाग में देवताओं का निवास होता है एवं यह कलश हमारे मस्तिष्क में स्थित अमृत का प्रतीक है और यह यात्रा हमें इंगित करती है उस दिव्य अमृत को प्राप्त करने की ओर।

सायं काल की प्रथम सभा में संस्थान द्वारा चंपा देवी पार्क  में सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा  ज्ञान यज्ञ का शुभारंभ हुआ। आध्यात्मिक जाग्रति के प्रसार हेतु श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन संस्थान का एक विलक्षण प्रयास है। जिसमें प्रभु की अनन्त लीलाओं में छिपे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को कथा प्रसंगों के माध्यम से उजागर किया जाएगा। इस कथा के दौरान सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या भागवत भास्कर महामनस्विनी साध्वी सुश्री कांलिदी भारती जी ने श्रीमद्भागवत कथा का महात्म बताते हुए कहा कि वेदों का सार युगों-युगों से मानव जाति तक पहुँचता रहा है। साध्वी जी ने श्रीमद्भागवत महापुराण की व्याख्या करते हुए बताया कि श्रीमद्भागवत अर्थात जो श्री से युक्त है, श्री अर्थात् चैतन्य, सौन्दर्य, ऐश्वर्य। ‘भगवतः प्रोक्तम् इति भागवत।’ भाव कि वो वाणी, वो कथा जो हमारे जड़वत जीवन में चैतन्यता का संचार करती है। जो हमारे जीवन को सुन्दर बनाती है वो श्रीमद्भागवत कथा है जो सिर्फ मृत्यु लोक में ही संभव है। 

साध्वी जी ने कथा कहते हुए यह बताया कि यह एक ऐसी अमृत कथा है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। इसलिए परीक्षित ने स्वर्गामृत की बजाए कथामृत की ही माँग की। इस स्वर्गामृत का पान करने से पुण्यों का तो क्षय होता है पापों का नहीं। किन्तु कथामृत का पान करने से सम्पूर्ण पापों का नाश होता है। कथा के दौरान उन्होंने वृन्दावन का अर्थ बताते हुए कहा कि वृन्दावन इंसान का मन है। कभी-कभी इंसान के मन में भक्ति जागृत होती है। परन्तु वह जागृति स्थाई नहीं होती जिस का कारण यह कि हम ईश्वर की भक्ति तो करते हैं पर वैराग्य नहीं, तड़प नहीं, भाव नहीं और ज्ञान नहीं। इसलिए वृन्दावन में जा कर भक्ति देवी तो तरुणी हो गई पर उस के पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्धावस्था में अचेत और निर्बल पड़े हैं। उन में जीवंतता और चैतन्यता का संचार करने हेतु नारद जी ने भागवत कथा का ही अनुष्ठान किया। जिस को श्रवण कर वो पुनः जीवंत और सबल हो उठे क्योंकि व्यास जी कहते हैं कि भागवत कथा एक कल्पवृक्ष की भाँति है जो जिस भाव से कथा श्रवण करता है उसे मनोवांछित फल देती है और यह निर्णय हमारे हाथों में है कि हम संसार की माँग करते हैं या करतार की। ‘श्री मद् भागवतेनैव भक्ति मुक्ति करे स्थिते।।’ अर्थात् यदि भक्ति चाहिए तो भक्ति मिलेगी, मुक्ति चाहिए तो मुक्ति मिलेगी।


                        कथा की अन्य झलकियां

भागवत कथा माहात्म्य में तुंगभद्रा नदी के तट पर निवास करने वाले आत्मदेव का वर्णन आता है। इस तुंगभद्रा के बारे में बताते हुए साध्वी सुश्री कांलिदी भारती जी ने बताया कि चैरासी लाख योनियों में उत्थान दिलवाने वाली यह मानव देह ही कल्याणकारी है जो हमें ईश्वर से मिलाती है। यह मिलन ही उत्थान है। आत्मदेव जीवात्मा का प्रतीक है। जिस का लक्ष्य मोह आसक्ति के बंधनों को तोड़ उस परम तत्व से मिलना है। यूँ तो ऐसी कई गाथाएं, कथाएं हम अनेकों व्रत, त्योहारों पर भी श्रवण करते हैं लेकिन कथा का मात्रा श्रवण करने या पढ़ने से कल्याण नहीं होता। जब तक इन्हें अर्थात् इनसे प्राप्त होने वाली शिक्षा को हम अपने जीवन में चरितार्थ नहीं कर लेते। ने प्रथम स्कंध् के अंर्तगत बताया महर्षि वेदव्यास ने लिखा ‘‘सत्यम् परम ध्महि’’ उन्हांने परमात्मा को सत्य शब्द से सम्बोध्ति किया। वह हमें समझा रहे हैं कि परमात्मा एक ही है जिसके विषय में संतो, महापुरूषों ने कहा- ‘एकं सद्विप्राः बहुध वदन्ति’ वह एक ही शक्ति है जिसे विद्वानो ने अलग-अलग नमो से संबोधित किया हैं। आज परमात्मा को अनेकों नामों से पुकारा जाता है परंतु वास्तव में वह एक ही तो शक्ति। वही शक्ति सब में प्रकाश रूप में विद्यामान है। एक शक्ति परमात्मा जो सत्य है सब में प्रकाश रूप में विद्यमान है और उस प्रकाश स्वरूप परमात्मा का प्राक्ट्य जब भीतर होता है तो आंतरिक अंधकार दूर हो जाता है। यह पांच विकार, दुःख-क्लेश, अशांति, अधीरता, चैरासी का भव-बंधन ये सब इसी अंधेरे की ही दी हुई सौगातें हैं। ईश्वर अंतरजगत का भुवन भास्कार है। वेदों के ऋषियों ने कहा-‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।’ ज्योति की ज्योति परम-ज्योति है। वहाँ न तो चक्षु पहुँच सकते हैं, न ही वाणी, न मन ही, न तो बुद्धि से जान सकते हैं, न ही दूसरों को सुना सकते है। उस प्रकाश स्वरूप परमात्मा का दर्शन तो मात्रा दिव्य दृष्टि के माध्यम से ही किया जा सकता है। जैसे इस लौकिक संसार को देखने के लिए दो आंखे दी है वैसे ही इस संसार के रचनाकार को देखने के लिए भी अलौकिक आंख दी है। हमारे मस्तक पर, भौहों के ठीक बीचोंबीच। जिस प्रकार से आप अपनी चर्म चक्षु के द्वारा दर्पण के माध्यम से अपने आप को निहारते है वैसे ही अपने अंतःस्थ ईश्वरीय प्रकाश और उसके अनंत वैभव का दर्शन दिव्य-दृष्टि के द्वारा कर सकते हैं। समस्त ग्रंथों व महापुरूषों ने उस सत्य स्वरूप परमात्मा को, ईश्वरीय प्रकाश को देखने का सशक्त साध्न दिव्य-दृष्टि ही माना है। यह दिव्य-दृष्टि आध्यात्मिक व अति सूक्ष्म दृष्टि है इसे खोलने के लिए स्थूल साध्नों या बाहरी ऑपरेशनों से जागृत नहीं हो सकती। इस अलौकिक उर्जा के स्रोत केवल और केवल एक पूर्ण गुरु, एक तत्त्ववेत्ता महापुरूष ही होते हैं। मात्रा उनमें ही इसके उन्मूलन की सामर्थ्य हैं

दीप प्रजवलन में मुख्य यजमान पुष्पदंत जैन  प्रदेश उपाध्यक्ष व्यापारी कल्याण बोर्ड उत्तर प्रदेश सरकार, श्री राजेश तुलस्यान जी, श्री रमेश चंद्र जी, अनिल कुमार सिंह जी0एस0टी0 अधिकारी कस्टम एवं श्री महेंद्र सिंह आदि गणमान्य उपस्थित रहे।  किया ।उत्तर प्रदेश सरकार की कैबिनेट मिनिस्टर डॉ  संजय कुमार निषाद जी ने संस्थान के अंतर क्रांति प्रकल्प बंदी सुधार कार्यक्रम भूरी भूरी प्रशंसा का उल्लेख करते हुए हुए सभा को संबोधित किया । अंत में उन्होंने परिवार सहित आरती में भी भाग लिया।

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