सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीएक बार की बात है एक और शिष्य प्रचार के लिए दूसरे नगर की ओर जा रहे थे। रास्ते में एक जंगल पड़ता था। गुरु -शिष्य उस जंगल के मध्य में पहुंच चुके थे। किंतु अब संध्या हो गई थी तो गुरु ने शिष्य को कहा अब यहीं रुक कर रात को ध्यान साधना और विश्राम करेंगे । रात्रि का पहला पहर बीत चुका था। शिष्य अपने गुरु के पास खड़ा होकर पहरा दे रहा था तभी कहीं दूर से हवा की गति से दौड़ता खूंखार लाल आंखों वाला एक राक्षस आया। इस राक्षस ने पूरे वेग से शिष्य पर कठोर शब्दों का वार किया तब उस शिष्य ने भी पिशाच पर क्रोध करना शुरू कर दिया। तब दोनों में वाक युद्ध छिड़ गया आखिरकार पिशाच क्रोध में पागल हो गया और उसने ऐसा प्रहार किया कि शिष्य वही बेहोश होकर गिर पड़ा। कुछ समय बाद जब शिष्य ने अपनी आंखें खोली तो अपने सिर को अपने गुरुदेव की गोद में पाया। उसने घबराते हुए गुरु से पूछा गुरुवर क्या आप पर भी लाल आंखों वाले राक्षस ने प्रहार किया? गुरु ने हां में सिर हिला दिया। शिष्य व्याकुल हो गया और बोला वह बहुत ही खूंखार राक्षस था गुरुवर आपको कहीं चोट तो नहीं आई। तब गुरु बड़े सहज भाव से बोले, नहीं पुत्र वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाया। मैंने उस पिशाच को दुर्बल कर दिया। तब शिष्य बोला मुझसे तो वह दुर्बल हो ही नहीं रहा था। तब गुरु ने कहा क्योंकि तुम उसको स्वयं बल दे रहे थे। तब शिष्य बोला पर मैं क्या करता? मैं जैसे ही उस पर वार करता था वैसे ही उसका बल और बढ़ जाता था। तब गुरुदेव ने समझाया वह राक्षस और कोई नहीं बल्कि क्रोध का पिशाच था ।इसलिए तुम्हारे क्रोध से वह और बलवान होता जा रहा था। परंतु जब वह मेरे समक्ष आया तब मेरे शांत व्यवहार ने उसका बल खत्म कर दिया और वह भाग गया।
बस यही रामबाण है क्रोध को खत्म करने का। अगर हम क्रोध की प्रतिक्रिया क्रोध से करने लग जाते हैं तो वह आग में घी डालने जैसा होता है। इसलिए यदि कोई आप पर क्रोध में कटु शब्दों का इस्तेमाल करता है तो आप विवेक और संयम का परिचय दें। शांत होकर परिस्थिति का सामना करें। यह क्रोध के पिशाच को दुर्बल कर देगा ।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
