सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीआत्मा और प्रकृति परमात्मा की ही दो शक्तियाँ बताई गयी हैं। प्रकृति जड़ है और आत्मा चेतन है। चेतन शक्ति ही भौतिक प्रकृति के सभी शरीरों को कार्य करने की शक्ति प्रदान करती है। शक्ति कहीं भी हो, अपना कार्य अदृश्य रहते हुए ही करती है। जैसे विद्युत शक्ति फ्रीज को ठंडा और हीटर को गरम करने का काम करती है। इसी तरह शुभ कार्य/सत्संग हो या अशुभ कार्य/कुसंग, दोनों में ही भगवान की शक्ति आत्मा अपना काम करती है। लेकिन भौतिक जगत में जन्म लेने के बाद मनुष्य शरीर की जरूरतों को जानकर केवल शरीर के बंधनों में ही जकड़ कर रह गया।
मनुष्य अपने जीवन के वास्तविक रहस्य को विस्मृत कर चुका है। जिस प्रकार भौतिक जगत की जानकारी के लिए सर्वप्रथम मनुष्य का जन्म जरूरी है इसी प्रकार आध्यात्मिक जगत की जानकारी के लिए मनुष्य जीवन में आत्मा का जन्म होना भी अति आवश्यक है। संसार में जन्म लेने का मूल उद्येश्य ही आध्यात्मिक जगत की प्राप्ति करना है। आध्यात्मिक जगत में प्रवेश पाने का पहला उपाय यही है कि हम स्वयं को जान लें कि हम कौन हैं? जब तक हम स्वयं को नहीं जानेंगे आध्यात्मिक जगत में प्रवेश नहीं कर सकते। आत्म विद्या ही एक ऐसी विद्या है जिसको जान लेने के बाद अन्य कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। आत्म विद्या को जाने बिना मनुष्य का जीवन एक साधारण व्यक्ति के जीवन के रूप में ही रहता है। अतः हमें किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते रहना चाहिए। जिससे हमारा मानव जीवन सार्थक हो जाए।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
