*मनुष्य को बिना किसी झिझक के ईश्वर की भक्ति में अपना मन लगाना चाहिए।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                श्री आर सी सिंह जी

श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं-  हे पार्थ जब मनुष्य मनोधर्म से उत्पन्न होने वाली इंद्रिय तृप्ति की समस्त कामनाओं का परित्याग कर देता है और जब इस तरह से विशुद्ध हुआ उसका मन आत्मा में संतुष्टि का अनुभव करता है तो वह विशुद्ध दिव्य चेतना को प्राप्त होता है। अर्थात वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। अतः जो मनुष्य पूर्णत: भगवत भक्त होता है उस में महर्षियों के समस्त गुण आ जाते हैं।  किंतु जो व्यक्ति अध्यात्म में स्थित नहीं होता उसमें एक भी योग्यता नहीं होती। क्योंकि वह अपने मनोधर्म  पर ही आश्रित होता है । इसलिए यहां यह ठीक ही कहा गया है कि व्यक्ति को मनोधर्म द्वारा कल्पित सारी विषय वासनाओं को त्यागना होता है। कृत्रिम साधन से इनको रोक पाना संभव नहीं।  किंतु यदि कोई भगवान की भक्ति में लगा हो तो सारी विषय वासनाएं बिना किसी प्रयास के दब जाती हैं। अतः मनुष्य को बिना किसी झिझक के ईश्वर की भक्ति में अपना मन लगाना चाहिए, क्योंकि यह भक्ति उसे दिव्य चेतना प्राप्त करने में सहायक होगी। अत्यधिक उन्नत जीवात्मा (महात्मा) अपने आपको परमेश्वर का शाश्वत दास मानकर हमेशा खुश रहता है। ऐसे आध्यात्मिक पुरुष के पास भौतिकता से उत्पन्न एक भी विषय -वासना पास नहीं आ सकती। वह अपने आप को निरंतर भगवान का सेवक मानते हुए सहज रूप से हमेशा प्रसन्न रहता है।

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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