श्री आर सी सिंह जी
हम अपना जीवन विरोधाभासों में ही बिता देते हैं! कुछ सही चीजें कभी हमें गलत लगती हैं, तो कुछ गलत चीजें हमें सही! ऐसे में सवाल उठता है कि सही और गलत को लेकर क्या हमारी समझ इतनी है?जीवन में हम भौतिक सुखों की ओर भागते हैं, यह जानते हुए भी कि ये स्थायी नहीं है! जीवन ऐसी ही विसंगतियों से बना है और एक दिन सब कुछ खत्म हो जाता है!इस दुविधा से निकलने के लिए यह समझना जरूरी है कि जो चीज हमें खुशी देती है, वह हमें उतना ही दुख भी पहुंचाएगी! जीवन धागे में बंधी एक गेंद की तरह है, जो जितना एक और जाएगी, उतना ही दूसरी तरफ! हर युग के आध्यात्मिक दिग्गजों को यह बात पता होती है, क्योंकि इन्होंनें सवालों का सामना किया न कि उनसे भागे! यदि हम भी जीवन के सवालों से ऊपर उठना चाहते हैं, तो हमें उनका सामना करना होगा! जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब यह जरूरी हो जाता है कि इसके विरोधाभासों पर ना केवल विचार किया जाए, बल्कि उन्हें शांत भी किया जाए! हमें यह देखना होगा कि हमारे भीतर क्या चल रहा है?हम कैसे चल रहे हैं, क्या खा रहे हैं? आध्यात्मिकता की तरफ बढ़ते हुए हर चीज का महत्व होता है! जब हमारे अंदर के तूफ़ान शांत हो जाते हैं, तो हमारे आसपास की दुनिया भी शांत और स्थिर हो जाती है! जो कुछ भी है, वह हमारे मन में समाया हुआ है! ऐसे में इस एकचित्त एकाग्रता आंतरिक शांति और स्थिरता पर ध्यान केंद्रित करने से मानसिक उथल-पुथल के बीच जीवन जीना आसान हो जाता है! जीवन के उतार-चढ़ाव और छोटी-मोटी समस्याओं से घबराने की बजाय, अपने भीतर के विचार और भावनाओं पर ध्यान केंद्रित करने से मन को शांति मिलती है, चाहे चारों ओर कितना ही शोर क्यों न व्याप्त हो! जीवन के जो विरोधाभास दिखते हैं, वे हमारे अंदर पनपते हैं, हमें भ्रमित करते हैं, हमारी ऊर्जा को क्षीण कर देते हैं, और आखिरकार हममें इतनी शक्ति भी नहीं बचती कि हम रोज के काम भी ठीक से कर सकें! शांति और अशांति दोनों हमारे भीतर समाई हुई है। हम मन की शांति के लिए तरह-तरह के भौतिक उपाय करते हैं, फिर भी अशांत रहते हैं!इसकेे बजाय अगर हम अपने मन में बसे विचारों और भावनाओं पर ध्यान दें, तो हमें उनके कारण और प्रभाव दोनों दिखेंगे!ऐसे में आत्मज्ञान ही हमारा सच्चा हितेषी है!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
