सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीमनुष्य योनि परमात्मा को पाने के लिये ही मिली है। अर्थात् मनुष्य योनि में ही अपनी विवेक शक्ति को जगाया जा सकता है। जबकि बुद्धि द्वारा प्राप्त भौतिक ज्ञान व संपत्ति मनुष्य के मरने के साथ ही समाप्त हो जाते है। लेकिन जीवन में किये गये सत्संग द्वारा लिया गया आध्यात्मिक ज्ञान मरने के बाद भी बना रहता है, जोकि वास्तव में हमारी असली कमाई है।
परमात्मा की प्रकृति में सभी जीवों के पास एक मन अवश्य होता है। मनुष्य की नीचे की सभी योनियों के जीवों का मन अविकसित होता है, अर्थात विवेक शक्ति लगभग सोई ही रहती है। यह मन ही वह चाबी है, जो सत्संग में लगने से विवेक शक्ति जागने लगती है। यानी हमारी अज्ञानता मिटती जाती है और एक दिन पूर्ण अज्ञानता मिट जाने से परमात्मा की ओर की यात्रा शुरु हो जाती है। जबकि मन के कुसंग में लगने से मनुष्य संसार के बंधन में फंस जाता है। मनुष्य अपने जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग के अतिरिक्त जो कुछ भी करता है, उसे मोटे तौर पर कुसंग ही कहा जाता है।
मनुष्य योनि में ही रजोगुण/तमोगुण का मर्यादा से अधिक संग यानी भोग होने से हमारी शुद्ध आत्मा पर मल आ जाने से आत्मा अशुद्ध हो जाती है। जबकि मनुष्य योनि हमें पहले से बनी अशुद्ध आत्मा को शुद्ध करने के लिए ही मिली है। यदि मनुष्य मिले हुए वर्तमान जीवन में फिर से भोगों में ही लिप्त रहता है, तो अशुद्ध आत्मा और अधिक अशुद्ध होने से मरने के बाद नीचे की योनियो में बार-बार जन्म लेती है। देखिए मरते समय तक की गई ध्यान साधना व सत्संग से बन चुकी शुद्ध आत्मा पुन: मनुष्य योनि पाते ही उसी अनुपात में दोबारा मिल जाती है। फिर आगे की आध्यात्मिक यात्रा वहीं से आगे आरंभ हो उन्नति होती जाती है और एक दिन परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
