सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीभौतिक जगत में 84 लाख योनियां बताई गई है। लेकिन परमात्मा से जुड़ने यानि सत्संग करने के लिए विवेक शक्ति केवल मनुष्य योनि में ही जगती है। सत्संग सफेद रंग की तरह धीरे-धीरे अपना असर दिखाता है, जबकि कुसंग काले रंग की तरह तुरंत अपना असर दिखाता है। मनुष्य स्वभाव से तो रजोगुणी है और निरंतर सत्संग करते रहने से ही सतोगुणी बन सकता है। लेकिन कुसंग करते ही तमोगुणी बनते भी देर नहीं लगती और बढ़ा हुआ तमोगुण मरने के बाद अधोगति करवा देता है। इसलिए अपने जीवन में अधोगति से बचने के लिए आरंभ से ही बुराइयों से बचना चाहिए।
सामान्य मानव जीवन में कुछ भी जीने योग्य नहीं है। मात्र पेट भरकर खाना, नींद भरकर सोना, निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए हंसना, रोना या प्रेम प्रदर्शित करना आदि। सामान्य जीवन क्रियाओं में कुछ भी आकर्षक प्रतीत नहीं होता। उत्तम वस्त्रों, मंहगे गहनों या आलीशान भवनों की प्राप्ति हेतु रात दिन धन संग्रह में लगे रहना। और एक दिन इस सबको छोड़कर चल देना - - - यह सारा जगत व्यापार क्या मूर्खता से भिन्न कुछ और है?
मित्रो, मानव जन्म लेकर संसार में आने का कोई तो प्रयोजन है ही। इस तन को पाने के लिए बार-बार प्रभु से प्रार्थना करता है तथा वायदा करता है कि मानव तन पाकर वह अपना कल्याण करेगा। प्रभु भक्ति में लीन रहकर आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाएगा। क्योंकि ईश्वर भक्ति का पुरुषार्थ केवल मानव योनि में ही संभव है। कोई अन्य जीव, देव या किन्नर ऐसा करने में सक्षम नहीं। इसी लक्ष्य को प्राप्त करने का वायदा करके वह दुनिया में मानव के रूप में जन्म लेता है। परंतु विडम्बना देखिए, जिस नाम के सहारे वह गर्भ योनि में नौ मास तक उलटा लटका रहता है। उसी सनातन नाम को बाहर आते ही भूल जाता है। वह बड़ा होता है तथा उसे यह भी याद नहीं रहता कि संसार में उसके आने लक्ष्य क्या था।
अपने पतन के बीज मानव स्वयं ही बोता है। ईश्वर से विमुख होते ही वह संतापोन्मुख हो जाता है। हर प्रकार के दुखों के लिए वह खुद ही उत्तरदायी है। तो भी कदम कदम पर उसे प्रभु का संकेत व संदेश मिलता है। हमें भूल सुधार के अनेकों अवसर देता है। परंतु अभागा प्राणी उन संकेतों को नहीं पहचानता। उस दिव्य संदेश को अनदेखा अनसुना कर देता है। फलतः दुखों की गठरी सिर पर ढोता हुआ वह सभी प्रकार के नरकों की पीड़ा सहता चलता है। एक योनि से दूसरी, फिर तीसरी तथा अनगिनत योनियों पर्यंत।
अतः भगवत प्रेमियों, ईश्वर से जुड़कर ही जीवन जीने योग्य बनता है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
