**रुक्मिणी की दुविधा**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण घर लौटे तो उनकी पत्नी रुक्मिणी ने उनसे पूछा –“आप कैसे गुरु द्रोण और भीष्म पितामह की हत्या में सहभागी हो गए? वे तो इतने धर्मनिष्ठ और सद्गुणों से भरे हुए थे, उनका पूरा जीवन धर्माचरण में बीता था।”

शुरुआत में श्रीकृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया, परंतु जब रुक्मिणी ने बार-बार आग्रह किया तो वे बोले –

“निस्संदेह उन्होंने अपना पूरा जीवन धर्म और धर्मनिष्ठा में बिताया, परंतु उन्होंने एक ऐसा अपराध किया जिसने उनके समस्त जीवन के धर्म को नष्ट कर दिया।”

रुक्मिणी ने पूछा –

“वह अपराध क्या था?”

श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया –

“जब द्रौपदी को सभा में अपमानित किया जा रहा था, उसके वस्त्र हरण का प्रयास हो रहा था, तब वे दोनों वहाँ उपस्थित थे। वे बड़े-बुजुर्ग और गुरुजन होने के नाते इस अन्याय को रोक सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। यह एक अपराध ही उनके समस्त धर्म को नष्ट करने के लिए पर्याप्त था।”

रुक्मिणी ने फिर पूछा –

“लेकिन कर्ण का क्या? वह तो अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध था। उसके द्वार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। उसे क्यों मारा गया?”

श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया –

“निस्संदेह कर्ण महान दानी था। वह कभी किसी याचक को ‘ना’ नहीं कहता था। परंतु जब अभिमन्यु ने महान योद्धाओं का सामना करते हुए वीरगति पाई और मृत्यु शैया पर पड़ा था, तब उसने कर्ण से पानी माँगा। कर्ण के समीप ही निर्मल जल का एक छोटा-सा सरोवर था, परंतु दुर्योधन को अप्रसन्न न करने के लिए कर्ण ने अभिमन्यु को पानी नहीं दिया। एक मरते हुए वीर को पानी न देना उसके समस्त दान को नष्ट कर गया। बाद में युद्धभूमि में उसी जलाशय की मिट्टी में कर्ण का रथ फँसा और वहीं उसकी मृत्यु हो गई। 

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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