**मानव को स्थितप्रज्ञ बनना चाहिए। स्थितप्रज्ञ माने, जिसकी प्रज्ञा स्थिर है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

व्यक्ति परिस्थितियों का गुलाम है। जब वह किसी परिस्थिति से गुजरता है, तो उसके ही अनुसार ढल जाता है। परिस्थिति वश उसे जैसा सामाजिक व्यवहार करना होता है, वह वैसा ही करता है और अपनी वास्तविक पहचान ही भूल बैठता है। यदि परिस्थितियां नकारात्मक हों, तो उसका व्यवहार दुर्भावनाओं से दागदार हो जाता है।

   यह जीवन एक प्रयोग है।इसमें हमारे सामने अलग अलग परिस्थियां आती हैं।हमें विभिन्न किरदारों को निभाना पड़ता है। कभी हम पिता, पुत्र, पति, भाई तो कभी अपने व्यवसाय के अनुसार अध्यापक, डाक्टर, इंजीनियर आदि की भूमिका निभाते हैं। किंतु इन सभी कार्य व्यवहारों में हम अपनी वास्तविक पहचान भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारा निजी स्वरूप शाश्वत आत्मा है। और आत्मा द्वारा जागृत विवेक ही हमारे कार्य व्यवहारों का आधार होना चाहिये।

 भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं---

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।

आगमापायिनोनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।

  अर्थात, हे कुन्ती पुत्र! सभी परिस्थितियां, चाहे वे सुख देती हैं या दुख देती हैं, केवल इन्द्रियों से भोगी जाने वाली हैं। इन्द्रियों के संयोग से ही मानव परिस्थितियों का अनुभव करता है। इसलिये ये सभी अनित्य हैं, अस्थायी हैं।

   कितना स्पष्ट है कि मानव को स्थितप्रज्ञ बनना चाहिए। स्थितप्रज्ञ माने जिसकी प्रज्ञा स्थिर है।भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं---

य: सर्वत्रानभिस्नेहस् तत् तत् प्राप्य शुभाशुभम्।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।

अर्थात, जो मनुष्य किसी भी परिस्थिति में, चाहे शुभ हो या अशुभ, किसी भी वस्तु की प्राप्ति कर न प्रसन्न, न उसमें लिप्त होता है और न ही द्वेष करता है, बल्कि वह उन वस्तुओं व परिस्थितियों को अनित्य समझ कर अनासक्त रहता है-- वही मनुष्य स्थितप्रज्ञ कहलाता है। 

  जगद्गुरु श्रीकृष्ण फिर कहते हैं---

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।

आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।

  अर्थात, हे पार्थ, जब मनुष्य का मन सभी इच्छाओं व कामनाओं से रिक्त हो जाता है; वह अपने वास्तविक आत्म स्वरूप को जानकर उसमें स्थित हो जाता है, तब वह 'स्थितप्रज्ञ' कहलाता है।

  हमारा आत्मा में प्रतिष्ठित होना केवल ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना द्वारा ही संभव है।

  अत: ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर अपने निज स्वरूप को जानें। क्योंकि ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना से अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित रहने वाले "स्थितप्रज्ञ मनुष्य" का कभी पतन नहीं होता। वह जीवन रूपी प्रयोग में सफल होकर लक्ष्य को भेद लेता है।

**ओम् श्रीआशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

Post a Comment

Previous Post Next Post