महर्षि वेदव्यास नन्दन श्री शुकदेव जी ने
गंगा जी के तट पर स्थित मुमुक्षु राजा
परीक्षित से कहा –राजन्! यहसाराजगत्
पुरुषोत्तम भगवान् का लीला-स्थलहै।
इसकीतीन अवस्थाएं हैं -उत्पत्ति, स्थिति
और संहार। भगवान् की लीला(माया,
शक्ति याप्रकृति)केतीनगुण(फांसयापास)
हैं –सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण।
भगवान् इनतीन गुणों(शक्तियों) को स्वीकार कर क्रमसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश रुप धारण करते हैं तथा इसजगत्
की रचना, पालन तथा संहार कार्य करते हैं।वेहीभगवान् समस्त चराचर प्राणियों के
हृदय में अंतर्यामीरुपसेविराजमानहैं।
उनका स्वरुप और उसकी प्राप्ति का मार्ग
बुद्धि से परे है।वहभगवान्स्वयं अनंत हैं,
उनकी महिमा भी अपार है।
द्वितीय स्कंध,अ०४,श्लोक१२,
श्री मद्भागवत महापुराण
प्रस्तुतकर्ता
डां०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर
