**जैसे मृग को मरुस्थल में जल का भ्रम हो जाता है, इसी तरह अज्ञानी व्यक्ति को यह संसार सत्य दिखाई देता है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


'झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें।।

जेहि जानें जग जाइ हेराई।जागें जथा सपन भ्रम जाई।।'

(रा.च.मा.)

    जिसको जाने बिना झूठ भी सत्य ही भासता है, जैसे बिना प्रकाश के रस्सी भी सर्प प्रतीत होती है। जिस सत्य को जान लेने पर संसार उसी तरह समाप्त हो जाता है, जैसे जाग जाने पर स्वप्न का भ्रम दूर हो जाता है।

   जैसे मृग को मरुस्थल में जल का भ्रम हो जाता है, इसी तरह अज्ञानी व्यक्ति को यह संसार सत्य ही दिखाई देता है। यह संसार परमात्मा की माया द्वारा रची हुई लीला है। भगवान शिव पार्वती जी को बताते हैं-

'जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू।।

जासु सत्यता तें जड़ माया।भास सत्य इव मोह सहाया।।'

(रा.च.मा.)

    इस संसार को प्रकाशित करने वाले प्रभु श्री राम हैं।वह माया के स्वामी अनंत गुणों के भंडार हैं। परमात्मा का आश्रय पाकर यह माया भी सत्य भासती है।

  जैसे बाजीगर का खेल सत्य नहीं होता। उसी तरह यह संसार भी बाजीगर की रचना की तरह ही सत्य नहीं है। प्रभु माया के द्वारा संसार की रचना करता है।कभी एक से अनेक हो जाता है और कभी अनेक से एक हो जाता है। यह संसार प्रभु की माया द्वारा रचा हुआ एक खेल ही है, जो सत्य नहीं। सत्य तो केवल प्रभु ही है। भगवान शिव पार्वती को कहते हैं--

'उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।

सत हरि भजन जगत सब सपना।। (रा.च.मा.)

  हे पार्वती! यह मेरा अपना अनुभव है कि परमात्मा का नाम ही सत्य है। बाकी सारा संसार तो एक स्वप्न है।

   गुरुवाणी में कहा गया है---

यह सारा संसार छल रूप है। स्त्री, पुरुष इस संसार में कठोर श्रम करके भी अच्छा जीवन नहीं जी पा रहे हैं।यह संसार जो कि विष स्वरूप है, लेकिन जीवों को शहद की तरह मीठा लगता है। उस प्रभु को छोड़कर सभी कुछ नश्वर है। जो चिज नश्वर है, स्थिर नहीं है और जो हमारे न चाहते हुए भी हमसे दूर चली जाती है, उसे इकट्ठा करने का क्या लाभ? यदि केवल प्रभु और उसका राज्य स्थिर है तो हमें सबसे पहले उसी की खोज प्रारंभ करनी चाहिए

**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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