**आध्यात्मिक गुणों के बल पर ही रावण रूपी राक्षस को परास्त किया जा सकता है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

भगवान श्री राम का जीवन चरित्र समस्त मानव जाति के लिए प्रेरणा का स्रोत है।शब्द राम (RAM) का तो विस्तार ही-- Right Action Man है, अर्थात सदा उचित कृत्यों को करने वाला व्यक्तित्व। सद्गुणों से परिपूर्ण श्री राम का अनुसरण करके ही मानवता श्रेष्ठता को छू सकती है। राम के चरित्र को धारण कर हर क्षेत्र में सफलता के लक्ष्य पाए जा सकते हैं। जिस समय रावण मायावी रथ पर युद्ध के लिए पहुंचा तो विभीषण जी चिंतित हो उठे। उन्होंने देखा कि प्रभु श्री राम साधन विहीन, रथ विहीन भूमि पर खड़े हैं। वे बोल उठे---

नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना।

कहि बिधि जितब बीर बलवाना।।

-- हे नाथ! आपके पास न तो रथ है, न ही रक्षा कवच।तो फिर किस प्रकार आप बलवान रावण पर विजय प्राप्त करेंगे?

  श्री राम ने विभीषण को धीरज बंधाते हुए कहते हैं-- आध्यात्मिक गुणों के बल पर ही मैं रावण को परास्त करूँगा--

सुनहु सखा कह कृपा निधाना।

जेहिं जय होइ सो स्यन्दन आना।।

    आगे रघुवर ने इस गुण के रथ का विस्तृत वर्णन किया। वे विभिषण को समझाते हैं---

सौरज धीरज तेहि रथ चाका।

सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।।

बल बिबेक दम परहित घोरे।

छमा कृपा समता रजु जोरे।।

ईस भजनु सारथी सुजाना।

बिरति चर्म संतोष कृपाना।।

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा।

बर बिग्यान कठिन कोदंडा।।

--- शौर्य और धीरज ही मेरे रथ के पहिए हैं। सत्य और शील इसकी ध्वजा और पताका हैं। इस रथ के चार घोड़े हैं-- बल, विवेक, दम (इन्द्रियाँ शमन) और परोपकार। ये घोड़े क्षमा, कृपा और समता की रस्सी से रथ में जुते हुए हैं। ईश्वर का नाम भजन ही इसका सारथी है। वैराग्य तन का ढाल है। संतोष ही मेरी तलवार है। दान ही फरसा है और बुद्धि शक्ति है। श्रेष्ठ विज्ञान धनुष है। अचल मन तरकस की भांति है। मन पर नियंत्रण, यम, नियम ये सभी बाण हैं। गुरुदेव का पूजन ही अभेद्य कवच है। हे सखे! ऐसा धर्मयुक्त रथ जिसके पास है, वह तो दुर्जेय शत्रु को भी जीत सकता है। 

**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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