सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
आज के हर जिम्मेदार नागरिक, समझदार व्यक्ति, सज्जन पुरुष के यही उद्गार हैं- शराब मानवता विरोधी है। नर्क की जननी है।
परंतु आश्चर्य की बात है कि जब कुछ लोग मद्यपान को लेकर विचित्र सा तर्क देते हैं। कहते हैं- हमारे देवता गण भी तो सोमरस का पान करते थे। तो हम उनके वंशज होकर कैसे पीछे रह जाएं? भला इसमें क्या बुराई है?
दरअसल, कुछ लोगों ने स्वार्थपूर्ति हेतु अमृत तुल्य सोमरस को विषरूपी मदिरा की संज्ञा दे दी। किंतु वास्तविकता तो यह है कि सोमरस औषधिराज रस है।कई स्थानों पर तो इसे ज्ञान भक्ति रस से जोड़ा गया है।वेदों में स्पष्ट कहा गया है- औषधि को पीसकर उसके रस को ग्रहण करने वाला व्यक्ति समझता है कि उसने सोम का पान कर लिया। पर ब्रह्मा जी जिस सोम से परिचित हैं, उसे भोग्य पदार्थों में लिप्त व्यक्ति ग्रहण नहीं कर सकता।
कहने का अभिप्राय कि सोम ऐसा अतुलनीय रस है जिसे मनुष्य केवल पूर्ण गुरु के माध्यम से ही प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद ही व्यक्ति अमृत तुल्य सोमरस का पान करता है। हमारे आर्ष ग्रंथों में सुरा और सोम का भेद स्पष्ट रूप में बताया गया है- अनृतं पाप्मा तम: सुरा।जहाँ सुरा को अनृत और तम कहा गया। वहीं सोम को अमृत और ज्योति के समान बताया गया--"तद्यत तदमृतं सोम: स:"। "सत्यं वै श्रीज्योति: सोम:"।
सच मे, दोनों की तुलना असंभव है। भला विष और अमृत का क्या मेल! सुरा मानव को दानव बनाती है, तो सोम मानव को महामानव में परिणित करता है। एक का मुख नरक के द्वार की ओर खुलता है, तो दूसरा ईश्वर के साम्राज्य की ओर।
अत: दोनों को समान कहना मूर्खता का परिचय देना है। समग्र रूप से वेद शास्त्रों को समझें और धारण करें। सुरा नहीं, सोम को अपने जीवन में स्थान दें।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
