सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
पत्नी- बस तब से जब से आप यहाँ पर हैं।
पति यह सुनकर चुप हो गया। फिर काफी देर बाद बोला-- "तुम्हें याद है, हमारी शादी हुए कुछ ही दिन हुए थे कि मेरे पाँव में फ्रेक्चर आगया था.. तब तुमने ही मेरा साथ दिया था।" पत्नी ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया। पति ने फिर कहा-- "तुम्हें याद है, कुछ साल पहले मुझे कारोबार में कितना बड़ा घाटा हुआ था?
पत्नी- हाँ,अच्छी तरह याद है।
पति- तब हमारा सारा धन खत्म हो गया था। पर ऐसे समय में भी, उस दुःख में भी तुम मेरे साथ थी।
पत्नी- यह तो मेरा फर्ज था जी।
पति- और जब हमारा जवान बेटा हमें छोड़कर चला गया.. तब भी तुम ही मेरे साथ थी..
पत्नी- बस कीजिये, क्यों उन बातों को याद करना।
पति- याद करना जरूरी है।आज तक मेरे हर दुख के समय तुम मेरे साथ थी।यानी मेरे हर दुख का कारण तुम ही हो। तुम ही मेरे दुर्भाग्य का कारण हो।
यह है आज के इंसान की सोच। उसकी मानसिकता। जैसे आँख पर जिस रंग का चश्मा पहना हो, आस पास की हर वस्तु उसी रंग की दिखाई देने लगती है। वैसे ही मन पर जिस सोच का पर्दा डला हो, वैसी ही मानसिक दृष्टि बन जाती है।यदि सकारात्मक सोच हावी है, तो पत्थर में भी मूर्ति का दर्शन हो जाता है।नहीं तो, मूर्ति भी पत्थर दिखाई देती है। विडंबना है, आज का इंसान अधिकतर नकारात्मक सोच से जीवन को देखता है। इसीलिए हर पहलू में उसे कमी दिखाई पड़ती है। अपने वरदान भी श्राप भासित होते हैं और वह दुखी परेशान रहता है।इसलिए सुखमय, समृद्ध, शांत, आनंदमय जीवन जीने के लिए सबसे पहली आवश्यकता है, अपनी सोच को सकारात्मक करने की। अपने विचारों का उत्थान करने की।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
