**अनंत में समाया है 'शून्य' **

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

भारतीय ग्रंथों में ईश्वर को अनंत कहा गया है जिसका न आदि है, न अंत। यही नहीं, उनका मानना है कि यह 'अनंत' ही 'शून्य' भी है।

   महाभारत में भीष्म पितामह द्वारा भगवान विष्णु की कीर्ति का गुणगान करने वाले अंश को 'विष्णुसहस्त्रनाम' से जाना जाता है। 83वें श्लोक में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के संचालक 'श्री विष्णु' को 'अनंत' नाम से पुकारा गया है। पर वहीं इसके विपरीत 79वें श्लोक में श्री नारायण को शून्य नाम से संबोधित किया गया है।

   कहीं  'अनंत' कहीं  'शून्य'! एक अनंत सत्ता शून्य कैसे हो सकती है?

  शंकराचार्य जी ने विष्णुसहस्त्रनाम पर लिखी अपनी टीका, 'सहस्रनाम भाष्य में कहते हैं कि ईश्वर को 'शून्य' नाम से संबोधित करना बिल्कुल उचित है।कारण कि वह ब्रह्म निर्गुण है अर्थात गुणों से रिक्त, 'गुण शून्य' है। मानवीय समझ में आने वाले गुणों से परे वह ब्रह्म निर्गुण है।इसलिए उस अनंत सत्ता को शून्य कहना निःसंदेह यथोचित है।

    शून्य में समाया है अनंत। 

जब हम 'शून्य' के गर्भ को टटोलते हैं, तो हम उस 'अनंत' सत्ता का दर्शन करते हैं।

  गणितज्ञ भास्कराचार्य ने वैदिक गणित पर ब्रह्म की स्तुति करते हुए 'खहर' शब्द का प्रयोग किया। यह दो मूल शब्दों की संधि है- 'खम +हर'। 'खम' माने शून्य और हर माने विभाजन। इसका अभिप्राय हुआ कि जो ब्रह्म है, वह शून्य (खम) से विभाजित (डिवाइड) होने पर मिलता है। किसी भी अंक को आप जब शून्य से विभाजित करेंगे, तो अनंत (Infinite) सत्ता ही प्राप्त होगी। इसे ही ब्रह्म कहा गया।

   अतः अगर आप शून्य को समझ गए, तो अनंत तक पहुंच सकते हैं। इसे महर्षि अरविंद ने भी आध्यात्मिक स्तर पर अनुभव किया।तभी इस रहस्यमयी 'शून्य' और 'अनंत' रूपी मोतियों को अपनी काव्य माला 'सावित्री' में पिरो डाला। वे समझाते हैं कि सबसे पहले इस जगत का एक अद्भुत और अज्ञात आधार स्थापित हुआ। यह आधार   शिला एक शून्य, एक बिंदू की थी, जिसमें समग्र रहस्य समाया हुआ था। जहाँ 'शून्य' ने 'अनंत' को अपने गर्भ में धारण किया हुआ था... और जब सम्पूर्णता (अनंतता) और अभाव (शून्यता) एक ही शब्द थे।

*शून्य का साक्षात्कार कहाँ और कैसे?*

       वास्तव में अध्यात्म आत्मिक अनुभव का विषय है। मात्र किस्से कहानियों, मन्त्र सूत्रों का अध्ययन करना नहीं। संत कबीर बताते हैं कि हमारे अंदर शून्य महल  (तृतीय नेत्र) है, जहाँ अनंत ब्रह्म का अलौकिक प्रकाश दिखता है। इसके ऊपर पर्दा ढका हुआ है। जब वह आवरण उठता है, तब अनंत सत्ता (ईश्वर) का प्रकाश रूप में दर्शन होता है। अन्ततः इसी शून्य महल में ध्यान का अभ्यास करने से ईश्वर से पूर्णतया मिलन हो जाता है।

   अंत मे निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि शून्य रहस्यमयी है और इसका सार अध्यात्म का मूल है। आत्म विज्ञान के गूढ़ तत्त्व के कारण ही भारत विश्व को वैज्ञानिक भेंट- 'शून्य' प्रदान करने में सफल हो पाया है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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