सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा।
ईश्वर को पाने के लिए सांसारिक लोग कर्मकांड में ज्यादा विश्वास रखते हैं। ईश्वर के नाम पर बाहर से सब कुछ करते हैं, उसकी खोज में उसके दर्शन के लिए दूर दराज तीर्थ स्थलों पर जाते हैं। कुछ लोग तीर्थ स्थलों की परिक्रमा करते हैं। कुछ तो 10 - 20 ,50- 100, चक्कर भी लगा लेते हैं। एक दूसरे को देखकर नए लोग भी यही सब करने लगते हैं। तब यह एक प्रचलन बन जाता है।
हमारे ऋषि महर्षियों ने प्रदक्षिणा के बारे में बताया है।
'असली प्रदक्षिणा क्या है ?'
शंकराचार्य जी लिखते हैं -
*परिभ्रमन्ति ब्रह्मांड -सहस्राणि मयी श्वेरे।*
*कूटस्थाचलरूपोऽहमिति ध्यानं प्रदक्षिणम।।*
-जो सहस्त्र ब्रह्मांड उस अचल स्थिर ईश्वर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते हैं-वह है वास्तविक प्रदक्षिणा। इसी प्रकार, त्रिकुटी में स्थित उस ईश्वर को केंद्र बनाकर, उसका ध्यान करना ही सही अर्थों में प्रदक्षिणा कहलाती है। नहीं तो, ईश्वर तो कण-कण मे समाया है।उसके धाम की बहार से परिक्रमा करना कैसे संभव हो सकता है?'
भक्ति मार्ग पर बाहरी कर्मकांड में न उलझकर, पूर्ण गुरु के द्वारा ब्रह्मज्ञान रूपी तत्वों को ग्रहण करना चाहिए। एक विवेकी भक्ति बनकर समाज के आगे ऐसा उदाहरण रखना चाहिए, जिससे सबको सही दिशा में बढ़ाने की प्रेरणा मिले।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी ✍️
