श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा अर्जुन से कहा –
पार्थ! कर्म तथा अकर्म में भेद बुद्धिमान्
पुरुष भी नहीं कर पाते हैं क्योंकि कर्म की
गति बड़ी गहन है। जो पुरुष कर्म और अकर्म में भेद समझ जाता है वह कर्म–
बंधन अर्थात् जन्म -मरणसे छूट जाता है।
अर्जुन!कर्मकेतीनभेदहैं–
१-कर्म–जोकर्मकर्मकेफलकीइ्च्छा/चाह/काम/कामना से चिपक कर/आसक्त होकर किया जाता है उसे कर्म/सकाम कर्म कहते हैं । ऐसे कर्म से जन्म -मरण/
भव-चक्र/संसार मिलता है।
२-अकर्म–जोकर्म कर्म-फलकोछोड़ कर, कामना/इच्छारहितहोकर,अकाम/निष्काम भाव से किया जाता हैउसेअकर्म/निष्काम
कर्म कहते हैं। ऐसे कर्म सेपाप-पुण्य/जन्म -मरण/भव-चक्र/ संसार से छुटकारा मिलता है । और
३-विकर्म-निषिद्ध कर्मकोविकर्मकहतेहैं
जैसे झूठ, चोरी, हिंसा, चुगली, घूसखोरी,
पीड़ा आदि। इससे तिर्यक्योनि, विभिन्न प्रकार के यातनादायकनरकमिलतेहैं—
अर्जुन! जो पुरुष सभी कर्मों में और उनकेफलमें आसक्ति/लगाव का भलीभांति त्याग करके संसारके आश्रय
से रहित हो जाता है और ईश्वर में नित्य
तृप्त हो जाता है ,वहभलीभांतिकर्मकरता
हुआभी असलमें कुछ भी नहीं करता।–
त्यक्त्वाकर्मफलासंगंनित्यतृप्तोनिराश्रय:।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोsपिनैवकिंचित्करोतिस:।।
–अध्याय४,श्लोक२०
प्रस्तुतकर्ता
डां.हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर।
