सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री कृष्ण- 'वे पांडव जिनकी आत्मा सदा धर्म में वास करती है, उन्होंने दुर्योधन को आहत किया? भीमसेन को विष देना और फिर उसके हाथ पैर बांधकर गंगा में निश्चित हत्या के लिए डुबो देना, वारणावत के लाक्षागृह में हमारी बुआ सहित पांचों भाइयों की हत्या का प्रयास, द्यूतक्रीड़ा द्वारा छलना- मैं कहाँ-कहाँ तक दुर्योधन के पाप गिनाऊँ? और आपने उसके सत्कार एवं उसकी चाटुकारिता से प्रसन्न होकर उसे अपने पट्ट शिष्य का सम्मान दे डाला। ऐसे दुष्ट और अधम शिष्य के गुरु होने का आप क्या यश पाएंगे, दाऊ?'
पर बलराम को दुर्योधन का सारा व्यवहार कूटनीति का एक अंग लगता था। वे अब भी सोच रहे थे- 'राज्य पाने के लिए राजा युद्ध तो करते ही हैं। ऐसे में दुर्योधन ने यदि छल रूपी बल का आश्रय लिया, तो क्या अनुचित किया?'
'इसलिए... इसीलिए कहता हूँ दाऊ कि पापी का अन्न नहीं खाना चाहिए।' कृष्ण के स्वर में बलराम के चिंतन को लेकर पीड़ा प्रकट हुई, 'अन्न हमारी प्राण ऊर्जा बनता है। उसका पाप अथवा पुण्य हमारी जिह्वा से बोलता है और बुद्धि उस पाप अथवा पुण्य के अन्न से उत्पन्न हुई नकारात्मक और सकारात्मक ऊर्जा से हमारे मस्तिष्क को वशीभूत कर परिचालित करती है। पर आप इस विज्ञान को समझें तब न।' कृष्ण बलराम को जैसे धिक्कार रहे थे, 'दुर्योधन की मदिरा में पाप मिला है, दाऊ! पाप! उसमें जो लालिमा है, वह धर्मात्माओं के रक्त की है।वह आपको चषक पात्रों में ऋषियों का रक्त पिलाता है।'
बलराम को कृष्ण की वाणी की अनुगूंज उनके रोएँ रोएँ में सुनाई दे रही है- 'इसीलिए मैं पापियों का अन्न नहीं खाता। पाप का अन्न विवेक के लिए दीमक का काम करता है। जिस भाव का भोजन खाओगे, उसी भाव की उर्जा को पोषित करोगे। भाव की ऊर्जा ही सत, रज और तम गुणों को पोषण देती है।... आप इतने बुद्धिमान और धार्मिक व्यक्ति हैं, किन्तु उस नराधम दुर्योधन के अन्न का प्रत्यक्ष प्रभाव मैं आपमें देख रहा हूँ।...
'यदि दुर्योधन या उसका कोई दूत आए तो मैं क्या कहूँ? बलराम ने बुझे स्वर में पूछा।
'यह आपको सोचना है दाऊ।' कृष्ण ने तटस्थ स्वर में कहा।
'कैसे सोचूँ?'
'अपनी आत्मा को साक्षी बनाकर।' कृष्ण मुस्कुराए।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
