सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
एक नशासेवी के लिए नशा केवल तन कि नहीं, मन की खुराक भी बन जाता है। नशा उसके मन की गहन वृत्ति (प्रगाढं प्रकृति) बन जाता है। नि:संदेह नशे का पर्याय है बिष! इस बिष का निरंतन सेवन करने से व्यसनी के शरीर का अणु-अणु विषाक्त हो जाता है। हीरोइन जैसे नशो से प्राण शक्ति क्षीण होने लगती है। नस -नाड़िया छिन- भिन्न होकर सिकुड़ जाती है। देह के अवयव (Cell) और कोशिकाएं (Tissues) भी धीरे-धीरे मृतप्राय होती जाती है।कोकेन से तो रक्त- प्रवाह (blood circulation) तक पर प्रभाव पड़ता है तथा व्यसनी के शरीर में स्थान -स्थान पर खून सुखकर जम जाता है। सिगरेट शराब आदि नशो से ग्रस्त व्यक्तियों के रक्त में ऑक्सीजन के स्थान पर कार्बन- डाइऑक्साइड और कार्बन- मोनोऑक्साइड जैसी विषैली गैसे घुल जाती है। इन सभी दुष्प्रभाव के कारण नशासेवी भयंकर शारीरिक यातनाएं झेलता है। कभी-कभी तो इस पीड़ा को विस्मृत करने के लिए वह नशे के बेसुध संसार की ओर भागता है। व्यक्ति के नशा के कारण पूरा परिवार बिखर जाता है। हमारा एक महत्वपूर्ण दायित्व व्यसनी के तन-मन को रोगरहित व स्वस्थ करना होना चाहिए। हम अपने 'बोध' नमक नशा मुक्ति अभियान के अंतर्गत ऐसी ही एक औषधि एवं क्रिया द्वारा नशा पीड़ितों पर अनुसंधान करते हैं इससे कहते हैं- *ब्रह्मज्ञान*! ब्रह्मज्ञान में दीक्षित होते ही पीनियल ग्रंथि सक्रिय हो, हाइपोथेलेमस तक अपने संकेत पहुंचती है और देहतंत्र की स्राव प्रणाली को सुव्यवस्थित कर देती है। शरीर के चक्र सक्रिय होकर डायनेमो की तरह कार्य करने लगती है ।फलत: देह की बैटरी रिचार्ज व पुन: स्वस्थ हो जाती है। इतना ही नहीं, आत्मशक्ति भी जागृत होती है। जो व्यसनी के मन की लगाम को खींच कर रखती है।
संस्थान के संस्थापक एवं संचालक तथा 'बोघ' नमक नशा मुक्ति अभियान के पुरोधा श्री गुरु आशुतोष महाराज जी की उक्त विवेचना सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है। विज्ञानसम्मत होने के साथ-साथ प्रयोगात्मक (प्रैक्टिकल) और उससे भी बढ़कर जांची परखी भी गई है। आपसे ब्रह्मज्ञान की प्रणाली पाकर व उसका अभ्यास कर आज देश-विदेश के सहस्त्रों नशा - पीड़ित लोग पूर्णत: स्वस्थ हो चुके हैं। नशाविहीन जीवन के परों से स्वतंत्र गगन में उड़ान भर रहे हैं।
'ॐ श्री आशुतोषाय नमः '
श्री सियाबिहारी जी✍️
