**सिर्फ कर्मकांड एवं नाम जपन आदि अधूरी पद्धतियों में समय न देकर पूर्ण गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की दीक्षा ले ईश्वर का दर्शन करना चाहिए।**

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

हमारी यह सोच है कि जहाँ हमने अपना समय या धन या ऊर्जा लगाई है, हमें वहाँ से कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलना चाहिए। यानी हम अपने बीते हुए कल में किए गए निवेश को ही लेकर बैठे रहते हैं। हम यह नहीं समझ पाते कि उस भूत को पकड़ने से हम अपने वर्तमान और भविष्य को भी खराब कर रहे हैं। जबकि होना तो यह चाहिए कि भूत में लगाया गया- धन, समय या ऊर्जा जो डूब गया है, उससे हम सबक लेकर वर्तमान में वो निर्णय लें जो हमारे भविष्य को बेहतर बनाएँ।

   आइए, इस सूत्र को अपने जीवन पर लगाकर विश्लेषण करते हैं। कई बार, सौभाग्य से हमें यह संदेश मिलता है कि समाज में एक ऐसे पूर्ण गुरु भी हैं, जो ज्ञान दीक्षा के समय ही ईश्वर का साक्षात्कार करा देते हैं, जो कि सद्गुरु की शास्त्र सम्मत पहचान भी है। पर यदि हमने पहले कहीं  अन्य गुरु से दीक्षा ली हुई होती है, तो ऐसे में हमारा क्या मनोभाव रहता है? यही कि इतना समय, धन व ऊर्जा हम इस वर्तमान ज्ञान पद्धति या गुरु के दरबार में लगा चुके हैं, इसलिए अब कैसे पीछे हट सकते हैं? थोड़ा और अभ्यास करके देख लेते हैं।हो सकता है, आगे चलकर यहीं से प्राप्ति हो जाए। अब इन सारे प्रयासों पर मिट्टी डालकर, एक नए गुरु की ओर क्यों और कैसे बढ़ें?बस इसी उधेड़बुन में हम ताउम्र अपूर्ण गुरुओं और उनकी अपूर्ण साधनाओं में लगे रहते हैं।

    लेकिन हम आपसे निवेदन करते हैं कि भूतकाल में की गई गलती को वर्तमान में न दोहराएँ।उससे सीख लेकर वर्तमान और भविष्य को सुन्दर बनाएँ। चाहे कितने ही साल आपने कर्म-कांडों, नाम-जपन आदि अधूरी पद्धतियों को दे दिए, पर अब पूर्ण गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लें और ईश्वर का दर्शन प्राप्त करें। कहीं ऐसा न हो कि अपनी समस्त श्रद्धा और अस्तित्व निवेश करने के बाद, जीवन के अंतिम समय में यह समझ आए कि हमसे भूल हो गई।ईश्वर का दर्शन तो हुआ ही नहीं।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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